गर्मी आते ही बिजली गुल: लापरवाही या सुनियोजित नाकामी?*
दीनदयाल यदु/जिला ब्यूरो चीफ
छुईखदान । जैसे ही तापमान चढ़ा, वैसे ही बिजली व्यवस्था धराशायी हो गई। हर साल की तरह इस बार भी वही कहानी—अघोषित कटौती, बार-बार ट्रिपिंग और घंटों ब्लैकआउट। सवाल यह है कि क्या बिजली विभाग गर्मी के लिए कभी तैयार रहता भी है, या हर बार जनता को अंधेरे में ही रखा जाएगा?

*जनता बेहाल, विभाग बेपरवाह*
भीषण गर्मी में जहां एक-एक मिनट भारी पड़ रहा है, वहीं बिजली गुल होते ही लोगों का गुस्सा फूट रहा है। रात भर पसीने में डूबकर गुजारना मजबूरी बन गया है। छोटे बच्चे, बुजुर्ग और बीमार लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं—लेकिन जिम्मेदारों को इससे कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता।
*पानी भी हुआ ‘गायब’*
बिजली गई तो पानी भी गया। मोटर बंद, टंकियां सूखी—लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। क्या विभाग को यह समझ नहीं कि बिजली सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है?
*व्यापार और पढ़ाई चौपट*
दुकानों का काम ठप, छोटे उद्योग प्रभावित और छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह बाधित—हर वर्ग इस अव्यवस्था की मार झेल रहा है। लेकिन विभाग के पास हर बार वही पुराना बहाना—“लोड बढ़ गया”, “मेंटेनेंस चल रहा है”।
*हर साल वही बहाना, कब तक?*
सबसे बड़ा सवाल—जब हर साल गर्मी आती है, तो विभाग पहले से तैयारी क्यों नहीं करता? ट्रांसफार्मर अपग्रेड, लाइन में सुधार और लोड मैनेजमेंट की योजनाएं सिर्फ फाइलों तक ही क्यों सीमित रहती हैं?
*जवाबदेही तय होनी चाहिए*
अब वक्त आ गया है कि इस लापरवाही पर सख्त सवाल उठें। सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता को 24 घंटे बिजली देने के दावे करने वाले आखिर इस बदहाल व्यवस्था पर क्या जवाब देंगे?
नगर वासियों का कहना है कि अगर अभी भी व्यवस्था नहीं सुधरी, तो यह साफ है कि —यह समस्या नहीं, बल्कि विभाग की नाकामी और लापरवाही का परिणाम है।




