राजधानी से जनता तक कोरबा| (संगम दुबे)| भूख जब जंगलों से निकलकर सरकारी दफ्तरों तक फरियाद करने को मजबूर कर दे, तब सवाल सिर्फ पेट का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के दावों का भी होता है। ऐसा ही एक चिंताजनक मामला कोरबा जिला से सामने आया है, जहां कोरबा ब्लॉक के नकिया पंचायत में रहने वाले 50 से भी अधिक पहाड़ी कोरवा परिवारों को बीते तीन महीनों से शासकीय राशन नहीं मिला है।

हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) में शामिल पहाड़ी कोरवा परिवार जंगल छोड़कर कलेक्ट्रेट पहुंचे और जिला कलेक्टर को अपनी भूख की पीड़ा सुनाई।
महिलाओं का कहना है कि राशन नहीं मिलने से परिवारों को भरपेट भोजन नसीब नहीं हो रहा, मजबूरी में कंद-मूल और वनोपज के सहारे जीवन यापन करना पड़ रहा है।
पीड़ित पहाड़ी कोरवा कहती है
“तीन महीने से राशन दुकान जाते हैं, हर बार यही कहा जाता है कि स्टॉक नहीं आया है। बच्चों को खिलाने के लिए जंगल पर निर्भर हैं। पेट की आग कैसे बुझे?”
सरकारी दावों के विपरीत, जिन समुदायों को प्राथमिकता और विशेष संरक्षण की बात कही जाती है, उन्हें अनाज तक न मिल पाना खाद्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि राशन का आवंटन हुआ है, तो उसका वितरण क्यों नहीं किया गया और इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
एक अन्य पहाड़ी कोरवा पीड़ित का कहना है:
“सरकार द्वारा मिलने वाला राशन नहीं मिला, पैसे की कमी हैं भूख मिटाने की चिंता के बीच मजबूरी में 60 किलोमीटर दूर कलेक्टर के पास आना पड़ा।”
हालांकि मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला कलेक्टर ने खाद्य विभाग को तत्काल जांच के निर्देश दिए हैं और दो दिनों के भीतर सभी पात्र हितग्राहियों को राशन वितरण सुनिश्चित करने को कहा है। अब देखना यह होगा कि यह निर्देश जमीन पर कितनी तेजी और ईमानदारी से लागू होते हैं।
कोरबा में राशन वितरण को लेकर अनियमितता के मामले सामने आते हैं, शिकायतों के बाद जमीनी स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों के निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठते है ।
Author: Ishwar Naurange
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