बतौली महाविद्यालय में ‘जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत’ विषय में कार्यशाला संपन्न आदिवासी संस्कृति को संरक्षित और संवर्धित करना बहुत आवश्यक: शैहून मिंज विद्यार्थियों ने पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण धारण कर एवं गीत, नृत्य प्रस्तुत कर जनजातीय संस्कृति का किया प्रदर्शन

बतौली। उक्त कथन शासकीय महाविद्यालय बतौली में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में प्रसिद्ध जनजातीय लोक कलाकार शैहून मिंज ने मुख्य वक्ता के तौर पर कही। कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बदलते हुए परिवेश में जल, जंगल और जमीन को बचाने के साथ जनजातीय संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं का संरक्षण बहुत आवश्यक है। कार्यशाला की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. बी. आर. भगत ने किया। विशिष्ट अतिथि के तौर पर प्रसिद्ध जनजातीय लोक कलाकार मसीह जीवन खलखो, प्रो. बलराम चंद्राकर, प्रो. तारा सिंह मरावी, प्रो. गोवर्धन प्रसाद सूर्यवंशी, श्रीमती सुभागी भगत, सुश्री मधुलिका तिग्गा, प्रो. जिवियन खेस्स, अतिथि शिक्षक सुश्री शिल्पी एक्का, श्रीमती कविता प्रजापति एवं सुश्री सुमित्रा गिरि मंचासीन थे। कार्यक्रम का शुभारंभ जनजातीय वीर-वीरांगनाओं एवं छत्तीसगढ़ महतारी के पूजन अर्चन के साथ हुआ। अतिथियों का स्वागत पारंपरिक करमा गीत गाकर किया गया। जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत: ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान” शीर्षक पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में विद्यार्थियों ने पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण धारण कर जनजातीय संस्कृति का प्रस्तुतीकरण किया।

कार्यशाला में भारत भर के जनजातीय नायक-नायिकाओं के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को पी.पी.टी. के द्वारा प्रस्तुत किया गया। प्रो. तारा सिंह मरावी के संयोजकत्व एवं प्रो. गोवर्धन प्रसाद सूर्यवंशी सह-संयोजकत्व में आयोजित कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने जनजातीय गीत सुआ, करमा व शैला के गायन के साथ सुआ नृत्य, करमा नृत्य एवं शैला नृत्य का प्रस्तुतीकरण पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर के साथ किया। समस्त अतिथियों का स्वागत परंपरागत जनजातीय गमछा देकर किया गया। कार्यशाला में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए प्रो बलराम चंद्राकर ने देशभर के जनजातीय समाज के वीरों के योगदान का जानकारी प्रदान किया इनमें भगवान बिरसा मुण्डा, शहीद वीर नारायण सिंह, तिलका मांझी, सुरेंद्र साय जैसे स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के साथ फूलो- झानों जैसे वीरांगनाओं की शौर्य गाथाओं का बखान किया एवं जनजातीय समुदाय के प्रकृति पूजन और आध्यात्मिकता का वर्णन किया. महाविद्यालय के प्राचार्य बी. आर. भगत ने सरगुजा क्षेत्र के जनजातीय समाज के उत्थान के लिए काम करने वाले संत गहिरा गुरू एवं माता राजमोहनी देवी जी के सामाजिक कार्यों का उल्लेख किया साथ ही सरगुजा में बहुलता से निवासरत उरांव समाज के वीर नायक वीर बुधु भगत की गाथाओं का भी जिक्र किया। कार्यशाला का संचालन करते हुए संगोष्ठी के सह- संयोजक प्रो. गोवर्धन प्रसाद सूर्यवंशी ने “स्वतंत्रता संग्राम में जनजातियों का योगदान: छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में” शीर्षक पर शोध पत्र प्रस्तुत करते हुए छत्तीसगढ़ में जनजातीय आंदोलन और विद्रोहों का क्रमवार प्रस्तुतिकरण किया। विद्यार्थियों ने भी जनजातीय संस्कृति, सभ्यता पर अपना विचार प्रस्तुत किया जिसमें बी.ए. अंतिम वर्ष की होलिका पैकरा, बी. एससी. अंतिम वर्ष की विद्या पैकरा एवं बी.ए द्वितीय वर्ष की खुशबू प्रजापति प्रमुख हैं। प्रकृति पूजक आदिवासी समुदाय के अतिथियों को उपहार स्वरूप एक-एक पौधा भेंट किया गया। कार्यशाला के संयोजक प्रो. तारा सिंह मरावी ने आभार प्रदर्शन किया।

Rajdhani Se Janta Tak
Author: Rajdhani Se Janta Tak

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