शिक्षक दिवस पर विशेष लेख शिक्षक बनाम समाज और राष्ट्र – डॉ कुंज किशोर प्राचार्य

राजधानी से जनता तक । जांजगीर। पामगढ़ – शिक्षक बनाम समाज और राष्ट्र विश्व के गौरवशाली इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर जब-जब हम दृष्टि पटल डालते हैं तो सुनहरी चमक लिए उन एक-एक पृष्ठों में एक-एक शब्दों से यह आगाज होता है कि इस पूरी दुनिया में शिक्षक एक ऐसा ताकतवर विवेकशील संयमित प्राणी होते हैं ।जो किसी समाज की संरचना से लेकर के उसे समाज की उत्थान , पुष्पित ,पल्लवी और विकसित होते तक शिक्षक का एक अमूल्य योगदान होता है समाज की उत्थान और पतन का मुख्य संचेतक शिक्षक के विचारधारा से सिंचित होते हैं जो शिक्षक मिट्टी जैसे अबोध बालक को अपने मेहनत के साथ विवेक के साथ उनके कल्पनाओं को जोड़ते हुए एक मूर्त रूप प्रदान करते हैं और उसे बच्चों के भविष्य निर्माण के साथ ही समाज की दिशा और दशा तय कर देते यदि शिक्षक का विचार बाबा साहब अंबेडकर जैसे ही महात्मा ज्योतिबा राव फुले जैसे भगत सिंह जैसे हीचंद्रशेखर आजाद जैसे हो कबीर दास जैसे हो गुरु घासीदास जैसे हूं और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे शिक्षक अपने विचारों में यदि वे पवित्रता के साथ ही साथ ईमानदारी सतनिष्ठा और लगन के साथ काम करते हैं तो निश्चित ही वह समाज एक उन्नत होगा समर्पित भावना के साथ विकसित होगा और समाज में उच्च नीच की भावनाओं को जगह नहीं मिलेगी जातिवाद वर्ग स्त्री पुरुष में भेद यह तमाम चीज बिल्कुल नहीं हो सकती और वहीं दूसरी ओर यदि द्रोण जैसे व्यक्तित्व के शिक्षक जिनकी रग रग में जाति धर्म वर्ग उच्च नीच की भावनाएं घर कर गई यदि वैसे शिक्षक आज भी पूरे समाज को खोखला करने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं आज बच्चों में इंसानियत रूहानियत मानवता दया प्रेम उत्साह की भावना के बजाय नफरत वर्गवाद उच्च नीच जातिवाद लड़ाई खुद से दंगा फसाद जैसे विचारधाराओं को जोड़कर शिक्षा को पुष्पित करना चाहते हैं की कलंकित करना चाहते हैं लेकिन साथियों वक्त का तकाचा है की आई हम सब मिल करके गुरु घासीदास की मानवतावादी डॉक्टर अंबेडकर के संता वादी कबीर दास की ज्ञानात्मक गुरु नानक की एकता और प्रेम दया भगत सिंह की देशभक्ति महात्मा ज्योतिबा फुले जी की बलिदान सावित्रीबाई फुले की त्याग रमाबाई अंबेडकर की त्याग और न जाने इस देश में एपीजे अब्दुल कलाम डॉक्टर साहब जैसे कितने शिक्षक पैदा लिए आज यह देश चल रहा है तो इन्हीं तमाम शिक्षकों के पुण्य अच्छे कर्मों के फल है कि हम आजादी की बेला में स्वतंत्रता समानता बंधुत्व की भावना लिए हुए गरीब तबके के बच्चों को निकले टपके के बच्चों को भी बराबर रूप से बिना भेदभाव किया हम पढ़ लिख पा रहे हैं तो निश्चित तौर पर दोस्तों लिए आजादी की दूसरी लड़ाई में शिक्षक रूपी एक सिपाही के रूप में अपनी ताकत के साथ समाज निर्माण में बच्चों के चरित्र निर्माण में और इस समाज की उन्नति इस देश उन्नति और विश्व कुटुंबकम की भावना को जागृत करते हुए एक कदम आगे बढ़े हमारी पुरातन व्यवस्था में गुरु का एक बड़ा महत्व होता था गुरु भी 24 घंटे के अपने दायित्व और कर्मों के साथ शीश में भाग बंद कर निकल जाते थे जिस जगह में बैठते थे वही जगह पाठशाला स्टार्ट हो जाता था जहां पर भी रुकते थे गुरु का सम्मान लोग करते थे आज इसी बात का छेद है दुख के साथ मुझे कहना पड़ रहा है की द्रोणाचार्य जैसे कुछ गुरु प्राचीन काल से लेकर के आज तक भी द्रोण का कोई कमी नहीं और इन्हीं लोगों ने विद्यार्थी और गुरु के बीच एक खाई पैदा किया बहुत कोशिश किया उसको बांटने का लेकिन आज भी हम पूर्ण रूप से सही नहीं कर पा रहे और मैं कहना चाहूंगा उन बच्चों को भी एकलव्य जैसे विद्यार्थी बनने का प्रयास करें निस्वार्थ भाव से तेज गति से बुद्धि से विवेक से अपने पढ़ाई में ध्यान दें गुरु कौन हैं यह तनिक भी ना समझे अपनी जज्बा के साथ गुरु को गुरु स्वीकार करें लेकिन इतना जरुर कहना चाहूंगा शिक्षक दिवस इस पावन बेला पर एकलव्य जैसे विद्यार्थी आज भी है।

उन्नत समाज निर्माण के लिए एक अच्छा और आदर्श गुरु का होना बहुत आवश्यक है

बिना अच्छे शिक्षक के हम समाज का निर्माण नहीं कर सकते और जब अच्छा गुरु नहीं बन सकते तो एक सुंदर राष्ट्र की कल्पना भी करना मूर्खता होगी और राष्ट्र का निर्माता शिक्षक ही हो सकते हैं ,कानून निर्माण की पहल में शिक्षक की भूमिका अहम होती है इसलिए आइए सीखें और एक बदलाव लिए एक परिवर्तन लिए इस कारवां को आगे बढ़ते हैं कि शिक्षक की भूमिका अब सिर्फ स्कूलों में नहीं बल्कि शिक्षक को आज विधानसभा में लोकसभा में राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री कार्यालय में और न जाने किन-किन जगहों पर शिक्षकों की आवश्यकता होगी तभी राष्ट्र का सही दिशा हम तय कर पाएंगे और एक अच्छे राष्ट्र निर्माण में शिक्षक निश्चित तौर पर पुरजोर कोशिश करेंगे विद्यार्थी और शिक्षक के बीच दूरी को कम करने के लिए एक कदम शिक्षक भी आगे कदम बढ़ाए और एक कदम बच्चे भी आगे बढ़ाएं तब कहीं जाकर हम गुरु शिष्य की परंपरा को एक संत रूप को गुरु शिष्य के स्नेह हम उचित रूप प्रदान कर पाएंगे आज शिक्षक बच्चों को अपनापन के साथ नहीं पढ़ पा रहे हैं दूसरी ओर बच्चे भी गुरु के साथ सम्मान के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रहे तो लिए आज हम शपथ लेते हैं इस शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरु और शिष्य के खाई को तत्काल समाप्त कर अपने मूल स्वरूप के आधार परगुरु निस्वार्थ भाव से बच्चों को शिक्षा देना शुरू करें और बच्चे ईमानदारी और सत्यता के साथ गुरु के आदेशों का निर्देशों का पालन करते हुए मेहनत करेंगे तो निश्चित तौर पर यह बाबा साहब के सपनों का भारत बनाने में उसके मिशन को पूरा करने में हमको ज्यादा वक्त नहीं लगेगा जय हिंद जय भीम जय शिक्षक।

Rajdhani Se Janta Tak
Author: Rajdhani Se Janta Tak

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