श्रद्धांजलि से जन आंदोलन तक: छुईखदान अब सिर्फ याद नहीं, जवाब मांग रहा है

दीनदयाल यदु/जिला ब्यूरो चीफ
छुईखदान । छुईखदान की धरती पर कल शाम केवल दीये नहीं जले, बल्कि दशकों से दबा गुस्सा, पीड़ा और उपेक्षा एकजुट होकर आंदोलन की लौ बन गई। 9 जनवरी 1953 के ऐतिहासिक गोलीकांड की पुण्यतिथि पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने उमड़ी भारी भीड़ ने यह साफ कर दिया कि छुईखदान अब सिर्फ इतिहास नहीं दोहरा रहा, बल्कि भविष्य की लड़ाई का ऐलान कर चुका है।
हजारों दीपकों की रोशनी के बीच छुईखदान से एक बुलंद और साफ संदेश निकला—जिले के नाम से छुईखदान हटाया जा सकता है, लेकिन छुईखदान को विधानसभा का दर्जा हर हाल में चाहिए। यह आवाज भावनात्मक नहीं, बल्कि अधिकारों की निर्णायक मांग थी।
कार्यक्रम की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि मंच से राजनीति नहीं, बल्कि पीड़ा और हक की बात हुई। भाजपा, कांग्रेस सहित विभिन्न दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक बिना किसी झंडे और पहचान के एक मंच पर खड़े दिखे। न कोई पार्टी, न कोई नेता—सिर्फ छुईखदान और उसका अधिकार। यही वजह रही कि श्रद्धांजलि सभा धीरे-धीरे एक उभरते जन आंदोलन में तब्दील होती नजर आई।
लोगों का कहना है कि खैरागढ़-छुईखदान-गंडई को मिलाकर जिला बनाना कागजों में भले ही बड़ी उपलब्धि हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी वही पुरानी उपेक्षा है। जिला बनने के बाद भी बड़े कार्यालय, अधिकारी, संसाधन और फैसले खैरागढ़ तक सीमित हैं। छुईखदान और गंडई आज भी खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस कर रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि तीन अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक क्षेत्रों को जबरन एक ही प्रशासनिक ढांचे में बांध दिया गया। खैरागढ़ से छुईखदान की दूरी करीब 15 किलोमीटर और गंडई उससे भी ज्यादा दूर है। ऐसे में प्रशासन तक पहुंच कठिन है और विकास की रफ्तार बेहद सुस्त।
अब यह नाराजगी एक सीधी और स्पष्ट मांग में बदल चुकी है—छुईखदान को विधानसभा क्षेत्र का दर्जा दिया जाए। लोगों का कहना है कि विधानसभा का दर्जा मिलने से ही क्षेत्र की समस्याएं सीधे सदन तक पहुंचेंगी और यही छुईखदान की सबसे बड़ी जरूरत है।
1953 में अधिकारों के लिए गोली खाने वाले शहीदों की स्मृति में जले दीपकों ने आज नई पीढ़ी को संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया है। मंच से संदेश बिल्कुल साफ था—यह लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की बेरुखी के खिलाफ है।
छुईखदान अब खोखले आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगा। यदि अब भी उसकी आवाज अनसुनी की गई, तो दीयों की यह शांत रोशनी जल्द ही एक उग्र और व्यापक जन आंदोलन में बदल सकती है—जिसकी गूंज राजधानी तक सुनाई देगी।




