सारंगढ़-बिलाईगढ़-:छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के “सुशासन” के दावों की जमीनी हकीकत एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि एक पदस्थ तहसीलदार को अपनी ही शिकायत पर FIR दर्ज कराने के लिए थाने के बाहर धरने पर बैठना पड़ रहा है। मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की सिटी कोतवाली का है, जहाँ कोरबा-दीपका में पदस्थ तहसीलदार भगत न्याय की गुहार लगाते हुए धरने पर बैठे हैं। आरोप है कि कलेक्टर के गनमैन ने तहसीलदार के बेटे को थप्पड़ मारा, जिससे उसके कान का पर्दा फट गया। चिकित्सकीय रूप से यह एक गंभीर शारीरिक चोट मानी जाती है।

गंभीर आरोप, लेकिन FIR नहीं
इतनी गंभीर घटना के बावजूद, तहसीलदार का आरोप है कि पुलिस FIR दर्ज करने से लगातार बच रही है।
जब एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी की शिकायत पर भी त्वरित कार्रवाई नहीं होती, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि—
क्या वर्दी और सत्ता से जुड़े लोगों के लिए कानून अलग है
आमरण अनशन पर तहसीलदार
न्याय न मिलने से आहत तहसीलदार भगत ने अब आमरण अनशन का रास्ता अपनाया है। एक ऐसा अधिकारी, जो रोज़ आम जनता की समस्याएँ सुनता है, आज खुद थाने के बाहर बैठकर इंसाफ़ माँगने को मजबूर है।
सिस्टम पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल एक परिवार पर हुए अत्याचार का नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
अगर तहसीलदार सुरक्षित नहीं
अगर डॉक्टर की रिपोर्ट के बाद भी FIR नहीं
अगर गनमैन जैसे रसूखदार व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं
तो फिर आम नागरिक की सुनवाई कैसे होगी?
सरकार से सीधे सवाल
क्या कलेक्टर के गनमैन को कानून से ऊपर माना जा रहा है?
FIR दर्ज न करने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
क्या यही “विष्णु का सुशासन” है, जहाँ पीड़ित को धरने पर बैठना पड़े
अगर तहसीलदार को इंसाफ़ नहीं, तो आम आदमी किससे उम्मीद करे?
यह घटना छत्तीसगढ़ में कानून के समान लागू होने के दावों पर करारा तमाचा है
सरकार और पुलिस प्रशासन को यह समझना होगा कि न्याय में देरी, अन्याय के बराबर होती है।
अब देखना यह है कि—
सरकार कार्रवाई करती है या चुप्पी को ही सुशासन मान लिया जाएगा?
Author: Rajdhani Se Janta Tak
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