विश्व आदिवासी दिवस विशेष: जल, जंगल, जमीन और जोहार! जानिए छत्तीसगढ़ की अद्भुत आदिवासी संस्कृति और महान क्रांतिकारियों की अमर गाथा
9 अगस्त के विशेष अवसर पर जानिए क्यों मनाया जाता है यह दिन,
क्या है जल-जंगल-जमीन से आदिवासियों का गहरा नाता, विश्व प्रसिद्ध ‘ढोकरा कला’ और कौन थे मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने वाले छत्तीसगढ़ के वीर सपूत और वीरांगनाएं।
गरियाबंद /मैनपुर— आज दुनियाभर में ‘विश्व आदिवासी दिवस’ बड़े उत्साह और गर्व के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन आदिवासी समाज के अधिकारों, उनके अस्तित्व की रक्षा के संकल्प और उनकी उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रतीक है, जो सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चल रही है। इस अवसर पर, आइए भारत के प्रमुख आदिवासी बहुल राज्य, छत्तीसगढ़ की समृद्ध परंपराओं और यहां के महान क्रांतिकारियों के संघर्ष पर एक नज़र डालते हैं।
कब और क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस?
हर साल 9 अगस्त को यह दिवस मनाया जाता है। 9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र (UN) ने आदिवासियों के अधिकारों और उनके अस्तित्व को बचाने के लिए जिनेवा में पहली बैठक की थी। इसी की याद में दिसंबर 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हर साल 9 अगस्त को इस दिन को मनाने की घोषणा की।
जीवन का आधार: “जल, जंगल और जमीन” से आदिवासियों का गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव
आदिवासी समाज और प्रकृति के बीच का रिश्ता केवल उपयोग या उपभोग का नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक और सहजीवी जुड़ाव है। छत्तीसगढ़ के गोंड, बैगा, हल्बा, मुड़िया और माड़िया जैसे जनजातीय समुदायों के लिए “जल, जंगल और जमीन” केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनके देवतुल्य हैं।
जंगल : जंगल आदिवासियों के लिए उनका घर, उनकी फार्मेसी (औषधालय) और उनके भरण-पोषण का मुख्य स्रोत है। वे पेड़ों को देवता मानते हैं (जैसे सरना या बूढ़ादेव का वास पेड़ों में माना जाता है)। वे जंगल से केवल उतना ही लेते हैं जितनी उन्हें आवश्यकता होती है; वे प्रकृति का दोहन नहीं, संरक्षण करते हैं।
जमीन : जमीन उनके लिए केवल मिट्टी नहीं, बल्कि उनकी ‘माटी दाई’ (धरती माता) है। यह उनकी पहचान, उनकी पुरखों की धरोहर और उनकी संस्कृति का आधार है। बस्तर में मनाए जाने वाले ‘माटी तिहार’ जैसे पर्व इसी धरती माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए होते हैं।
जल: नदियां, झरने और तालाब उनके जीवन और कृषि का आधार हैं। जल स्रोतों की पूजा करना और उन्हें पवित्र बनाए रखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
यही कारण है कि जब भी उनके ‘जल, जंगल और जमीन’ पर बाहरी हस्तक्षेप हुआ, आदिवासी समाज ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दी।
स्वतंत्रता संग्राम: छत्तीसगढ़ के महान आदिवासी क्रांतिकारी (पुरुष व महिलाएं)
भारत का स्वतंत्रता संग्राम और जल-जंगल-जमीन की लड़ाई आदिवासी शूरवीरों के बिना अधूरी है। छत्तीसगढ़ के इतिहास में पुरुष और महिला, दोनों ही क्रांतिकारियों ने विदेशी हुकूमत और दमनकारियों की ईंट से ईंट बजा दी थी।
वीर आदिवासी पुरुष क्रांतिकारी:
शहीद वीर नारायण सिंह (1857): बिंझवार जनजाति के इस महान नायक को छत्तीसगढ़ का प्रथम शहीद माना जाता है। उन्होंने अकाल के समय गरीबों के लिए जमाखोरों के अन्न के भंडार खोल दिए थे और 1857 की क्रांति में अंग्रेजों से डटकर लोहा लिया था।

गुंडाधुर (1910): बस्तर के प्रसिद्ध ‘भूमकाल विद्रोह’ के महानायक। धुरवा जनजाति के गुंडाधुर ने अंग्रेजों की वन नीतियों और शोषण के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट कर एक ऐतिहासिक सशस्त्र आंदोलन खड़ा किया था।
शहीद गेंद सिंह (1825): ‘परलकोट विद्रोह’ के नेता। इन्होंने मराठों और अंग्रेजों के संयुक्त शोषण के खिलाफ अबुझमाड़ क्षेत्र के आदिवासियों का नेतृत्व किया और फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूम लिया।
अजमेर सिंह (1774): ‘हल्बा विद्रोह’ के नायक, जिन्हें बस्तर के प्रथम शहीद के रूप में भी जाना जाता है।
झाड़ा सिरहा (1876): ‘मुड़िया विद्रोह’ के प्रमुख नेता जिन्होंने बस्तर में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला।
आदिवासी वीरांगनाएं और महिला क्रांतिकारियों का योगदान:
वीरांगना रानी दुर्गावती: गोंडवाना साम्राज्य की महारानी दुर्गावती का अदम्य साहस और बलिदान छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश की आदिवासी महिलाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है। उन्होंने अपने राज्य, अपनी प्रजा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए मुगलों की विशाल सेना से डटकर मुकाबला किया और मातृभूमि के लिए रणभूमि में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
माता राजमोहिनी देवी: सरगुजा अंचल की गोंड जनजाति की इस महान आदिवासी नेत्री ने आजादी के समय और उसके बाद एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया था। उन्होंने अकाल और शोषण के समय आदिवासियों को संगठित किया, जिसमें लगभग 80 हजार से ज्यादा लोग जुड़े थे।
भूमकाल और परलकोट की अनाम वीरांगनाएं: 1910 के भूमकाल विद्रोह में बस्तर की आदिवासी महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी। वे न केवल तीर-कमान लेकर जंगलों में अंग्रेजों से मोर्चा लेती थीं, बल्कि विद्रोहियों तक रसद पहुँचाने और गुप्तचर का काम भी करती थीं।
विश्व पटल पर चमकती आदिवासी कला और संस्कृति
अद्भुत लोक-नृत्य:
बस्तर के दंडामी माड़िया जनजाति द्वारा किया जाने वाला ‘गौर नृत्य’ विश्व के सबसे शानदार लोक-नृत्यों में गिना जाता है। इसमें पुरुष जंगली भैंसे के सींगों वाला मुकुट पहनकर मांदर की थाप पर शानदार नृत्य करते हैं। इसके अलावा अच्छी फसल की कामना के लिए ककसार और कर्मा जैसे सामूहिक नृत्य भी किए जाते हैं।


‘ढोकरा कला’ :
बस्तर और कोंडागांव क्षेत्र की ढोकरा कला आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। ‘मोम क्षय विधि’ से बनने वाली इन पीतल और कांस्य की मूर्तियों में आदिवासी जनजीवन को बड़ी बारीकी से उकेराजाताहै। 

बस्तर का दशहरा: यह दुनिया का सबसे लंबा, 75 दिनों तक चलने वाला त्योहार है, जो राम की रावण पर विजय का नहीं, बल्कि आदिवासी देवी-देवताओं (विशेषकर दंतेश्वरी माता) की आराधना और प्रकृति के उत्सव का पर्व है।
विश्व आदिवासी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि विकास की अंधी दौड़ में हमें इन मूल निवासियों की अमूल्य धरोहर, जल-जंगल-जमीन से उनके प्रेम और उनके महान क्रांतिकारियों के अमर बलिदान को हमेशा सहेज कर रखना है। जोहार!






