जिला प्रमुख नवीन दांदडें राजधानी से जनता तक/सुकमा – पति की मौत के बाद दो मासूम बच्चों के सहारे जिंदगी की कठिन जंग लड़ रही 40 प्रतिशत दिव्यांग विधवा महिला रीना भुआर्य पिछले 11 वर्षों से अनुकम्पा नियुक्ति की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही है। बार-बार आवेदन, पत्राचार और गुहार के बावजूद उसे अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। निराशा के बीच अब उसने छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की सदस्य दीपिका शोरी से न्याय की उम्मीद लगाई है।
पति की मृत्यु के बाद टूटा परिवार का सहारा
रीना भुआर्य ने बताया कि उसके पति स्वर्गीय केशुराम भुआर्य सुकमा जिले के बड़ेशेट्टी स्थित प्राथमिक शाला गंधारपारा में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के पद पर कार्यरत थे। सेवाकाल के दौरान ही उनका आकस्मिक निधन हो गया। पति की मौत के साथ ही परिवार का आर्थिक सहारा समाप्त हो गया और रीना पर दो छोटे बच्चों की पूरी जिम्मेदारी आ गई।
11 वर्षों से अनुकम्पा नियुक्ति के लिए संघर्ष
पति की मृत्यु के बाद रीना ने शासन के नियमों के अनुसार अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिल सकी। वह जिला कार्यालय से लेकर कई विभागों के चक्कर लगाती रही, मगर हर बार उसे केवल आश्वासन देकर लौटा दिया गया।
जिला से लेकर राज्य स्तर तक लगाई गुहार
रीना ने बताया कि उसने जिला स्तर ही नहीं बल्कि राज्य स्तर के कई अधिकारियों को पत्र लिखकर अपनी स्थिति से अवगत कराया। उसे उम्मीद थी कि कहीं न कहीं से उसकी समस्या का समाधान होगा, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
दुर्घटना में खो दिया दाहिना हाथ
रीना के जीवन का संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। वर्ष 2018 में अपने बेटे के दाखिले के लिए दंतेवाड़ा के छात्रावास गई थी, लेकिन वहां सीट नहीं मिलने के बाद लौटते समय बस दुर्घटना में उसका दाहिना हाथ कट गया। इस हादसे ने उसकी जिंदगी को और कठिन बना दिया।
दैनिक वेतनभोगी के रूप में मिला अस्थायी सहारा
लगातार प्रयासों के बाद वर्ष 2015 में उसे साइंस पार्क में 6000 रुपये मासिक मानदेय पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम मिला। बाद में डीएमसी के मौखिक आदेश पर वर्ष 2024 में पोटाकेबिन माटेमरका गादीरास में भृत्य के रूप में काम करने का अवसर मिला, लेकिन यह स्थायी नियुक्ति नहीं है।
दीपिका शोरी से अंतिम उम्मीद
रीना भुआर्य का कहना है कि वह वर्षों से दीपिका शोरी को जरूरतमंद महिलाओं की मदद करते हुए देखती आई है। इसी भरोसे के साथ वह अपनी पीड़ा लेकर उनके पास पहुंची है। उसे उम्मीद है कि महिला आयोग के हस्तक्षेप से उसे उसका अधिकार मिल सकेगा और उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा।
अब देखना होगा कि 11 वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रही इस दिव्यांग विधवा की पुकार पर प्रशासन और महिला आयोग कब तक संज्ञान लेते हैं।
Author: ISHWAR NAURANGE
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