धर्मांतरण और ST आरक्षण पर दिल्ली में आदिवासी समाज का बड़ा शक्ति प्रदर्शन

नई दिल्ली। अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण और धर्मांतरण के मुद्दे पर देशभर में नई बहस छिड़ गई है। धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को ST सूची से बाहर करने की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली में आदिवासी समाज का बड़ा महासमागम आयोजित किया गया। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले हुए इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोगों के पहुंचने का दावा किया गया।

 

दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित यह कार्यक्रम केवल सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे आदिवासी पहचान, आरक्षण और धार्मिक परिवर्तन के मुद्दे पर बड़ा सामाजिक-राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। मंच से वक्ताओं ने मांग उठाई कि जो लोग धर्म परिवर्तन के बाद पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाज, देवी-देवताओं और सामाजिक परंपराओं से अलग हो चुके हैं, उन्हें ST श्रेणी का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

 

डीलिस्टिंग की मांग बनी आंदोलन का केंद्र

 

कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा डीलिस्टिंग की मांग को लेकर रही। जनजातीय संगठनों का कहना है कि संविधान में आदिवासी समाज को दिया गया आरक्षण उनकी विशिष्ट संस्कृति, परंपरा और सामाजिक संरचना की रक्षा के उद्देश्य से था। ऐसे में धर्म परिवर्तन के बाद भी ST आरक्षण का लाभ जारी रखना मूल भावना के खिलाफ है।

 

संगठनों ने आरोप लगाया कि पिछले कई दशकों में मिशनरी गतिविधियों के जरिए आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ। गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठाकर लोगों को उनकी पारंपरिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान से दूर किया गया। अब समाज के भीतर यह मांग तेज हो रही है कि धर्म परिवर्तन करने वालों को ST सूची से बाहर किया जाए।

 

कई राज्यों से पहुंचे आदिवासी समुदाय के लोग

 

महासमागम में छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों समेत देशभर से आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। कई स्थानों पर पारंपरिक वेशभूषा और लोक वाद्ययंत्रों के साथ रैलियां निकालकर लोगों को दिल्ली रवाना किया गया। आयोजकों ने इसे हाल के वर्षों का सबसे बड़ा आदिवासी शक्ति प्रदर्शन बताया।

 

छत्तीसगढ़ से भी पहुंची बड़ी राजनीतिक भागीदारी

 

छत्तीसगढ़ से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित कई आदिवासी नेता कार्यक्रम में शामिल हुए। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं पर लंबे समय से प्रभाव डालने की कोशिशें हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान मिशनरी संस्थाओं को संरक्षण मिला, जिसके चलते धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ीं।

 

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अब अपनी मूल पहचान और परंपराओं की रक्षा के लिए एकजुट हो रहा है। नेताम ने स्पष्ट कहा कि जो लोग आदिवासी आस्था और परंपराओं से अलग हो चुके हैं, उन्हें ST आरक्षण का लाभ जारी रखना उचित नहीं माना जा सकता।

 

राजनीतिक और वैचारिक बहस हुई तेज

 

इस आंदोलन के बाद देश में राजनीतिक और वैचारिक बहस भी तेज हो गई है। समर्थक इसे आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई बता रहे हैं, जबकि विरोधी पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील विषय मान रहा है।

 

छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

 

इस मुद्दे का असर छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी दिखाई देने लगा है। पिछले विधानसभा चुनाव में लुंड्रा सीट से भाजपा प्रत्याशी प्रबोध मिंज को टिकट दिए जाने पर संगठन के कुछ वर्गों ने विरोध जताया था। उनका कहना था कि धर्म परिवर्तन कर चुके व्यक्ति को अनुसूचित जनजाति वर्ग की आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए। हालांकि भाजपा ने स्थानीय समीकरणों को देखते हुए उन्हें उम्मीदवार बनाया और उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की।

 

अब यदि भविष्य में डीलिस्टिंग से जुड़ा कोई विधेयक संसद में लाया जाता है और वह कानून का रूप लेता है, तो इसका प्रभाव कई राज्यों की राजनीति और आरक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है।

Sangam Dubey
Author: Sangam Dubey

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