*माननीय सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय ने उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व को लौटाई उसकी खोई हुई
जैव-विविधता*

गरियाबंद:उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) ने भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा टी.एन. गोदावर्मन जनहित याचिका क्रमांक 202/1995 में दिनांक 17 नवम्बर 2025 को दिए गए उस ऐतिहासिक निर्णय का हृदय से स्वागत एवं आभार व्यक्त किया है, जिसके अंतर्गत देशभर के टाइगर रिजर्वों के कोर क्षेत्रों में रात्रिकालीन यातायात पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए गए। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा दिसम्बर 2025 में इस निर्णय को लागू करने के पश्चात उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में इसके अत्यंत सकारात्मक पारिस्थितिक परिणाम दिखाई देने लगे हैं।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के दो कोर क्षेत्रों – उदंती कोर एवं सीतानदी कोर – से क्रमशः राष्ट्रीय राजमार्ग NH-130C और NH-130CD होकर गुजरते हैं। वर्षों तक इन सड़कों पर रात्रिकालीन यातायात के कारण जंगल की छत्राकार वृक्ष संरचना (Canopy Connectivity) खंडित होती रही, जिससे वृक्षों की ऊपरी परत पर निर्भर रहने वाली दुर्लभ गिलहरियों की प्राकृतिक आवाजाही प्रभावित होती थी।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले भारतीय विशाल उड़न गिलहरी (Indian Giant Flying Squirrel) तथा भारतीय विशाल गिलहरी (Indian Giant Squirrel/Malabar Giant Squirrel) जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ अपना अधिकांश जीवन वृक्षों की ऊपरी परतों में बिताती हैं और एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक छलांग अथवा ग्लाइड करके ही संचरण करती हैं। ये प्रजातियाँ वन की अखंड छत्राकार संरचना की सर्वश्रेष्ठ जैव-सूचक (Bio-indicators) मानी जाती हैं तथा आवास विखंडन के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं।
रात्रिकालीन यातायात बंद होने के पश्चात इन दुर्लभ वृक्षवासी प्रजातियों का विस्तार अब उदंती एवं सीतानदी कोर क्षेत्रों से आगे बढ़कर रिसगांव (कोर), इंदागांव (बफर), आरसीकन्हार (बफर) तथा कुल्हाड़ीघाट (बफर) क्षेत्रों तक दर्ज किया जा रहा है। यह विस्तार इस बात का संकेत है कि टाइगर रिजर्व की पारिस्थितिक गुणवत्ता एवं वृक्षीय संपर्कता (Canopy Connectivity) पुनर्जीवित हो रही है।
उल्लेखनीय है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व पिछले कुछ वर्षों में उन प्रजातियों का भी नया आश्रय बनकर उभरा है, जो सामान्यतः पश्चिमी घाट के सदाबहार वनों से जुड़ी मानी जाती हैं। इनमें मालाबार पाइड हॉर्नबिल तथा भारतीय विशाल उड़न गिलहरी प्रमुख हैं। हॉर्नबिल जैसे बड़े फलाहारी पक्षी बीज प्रसार (Seed Dispersal) के माध्यम से वनों के प्राकृतिक पुनर्जनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि विशाल गिलहरियाँ केवल स्वस्थ एवं निरंतर वन छत्र वाले क्षेत्रों में ही जीवित रह पाती हैं। इन प्रजातियों की बढ़ती उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि उदंती-सीतानदी का वन परिदृश्य पुनर्जीवन की दिशा में अग्रसर है।
इस परिवर्तन ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्रकृति-आधारित पर्यटन की नई संभावनाएँ भी उत्पन्न की हैं। जिन क्षेत्रों में पूर्व में वन्यजीवों का दर्शन विरल था, वहाँ अब दुर्लभ गिलहरियों, हॉर्नबिलों एवं अन्य वन्यजीवों की उपस्थिति के कारण सामुदायिक इको-टूरिज्म, बर्ड वॉचिंग और प्रकृति भ्रमण के नए अवसर विकसित हो रहे हैं, जिससे स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी नई दिशा मिलने की संभावना है।
रात्रिकालीन यातायात प्रतिबंध का एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ बाघ परिदृश्य (Tiger Landscape) के पुनर्जीवन के रूप में सामने आया है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व, इंद्रावती टाइगर रिजर्व, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली वन परिदृश्य तथा ओडिशा के सुनाबेड़ा वन्यजीव अभयारण्य के बीच एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारा (Tiger Corridor) है। जनवरी 2026 में सीतानदी कोर क्षेत्र में बाघ की गतिविधि दर्ज की गई, और यह पूर्णतः संभव है कि रात्रिकालीन व्यवधान समाप्त होने से बाघों की आवाजाही के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित हुई हों। टाइगर रिजर्व के कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी बाघों की गतिविधि दर्ज होने की संभावना बढ़ी है, जहाँ पिछले लगभग पंद्रह वर्षों से बाघों की उपस्थिति का कोई इतिहास नहीं रहा था।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रति अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता है। यह निर्णय केवल रात्रिकालीन यातायात का विनियमन नहीं है, बल्कि एक संघर्षरत टाइगर रिजर्व को उसकी खोई हुई जैव-विविधता, पारिस्थितिक संपर्कता और वन्यजीवों की स्वाभाविक गतिशीलता लौटाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
“कभी संघर्षरत रहा उदंती-सीतानदी आज पुनः जीवंत हो रहा है। रात्रि की शांति ने वन को उसका स्वाभाविक स्पंदन लौटाया है और जैव-विविधता को फिर से पंख दे दिए हैं |




