रैंप वॉक पर झलका पुनर्वास का विश्वास: कभी हाथों में थी बंदूक, आज कोसा सिल्क में मुस्कुराया बस्तर

बंदूक छोड़ स्वदेशी का दामन थामने वाली आत्मसमर्पित महिलाओं ने पेश की बदलते बस्तर की नई तस्वीर, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने किया आत्मीय संवाद

जिला प्रमुख नवीन दांदडें

सुकमा/रायपुर। कभी हाथों में बंदूक और आंखों में जंगल की अनिश्चितता थी, आज उन्हीं हाथों में छत्तीसगढ़ की हथकरघा विरासत है और चेहरे पर आत्मविश्वास की मुस्कान। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन में सुकमा जिले की 9 आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं ने कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा परिधानों में रैंप वॉक कर बदलते बस्तर की एक ऐसी तस्वीर पेश की, जिसने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
यह रैंप वॉक महज फैशन प्रस्तुति नहीं, बल्कि हिंसा से विकास, भय से विश्वास और भटकाव से सम्मानजनक जीवन की ओर बढ़ते बस्तर की कहानी बनकर सामने आया। कभी नक्सल हिंसा की राह पर चलीं ये महिलाएं आज आत्मसमर्पण के बाद कौशल विकास और पुनर्वास की राह पर आगे बढ़ते हुए समाज की मुख्यधारा में अपनी नई पहचान बना रही हैं।
मुख्यमंत्री ने बढ़ाया आत्मविश्वास

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आत्मसमर्पित महिलाओं से आत्मीय संवाद किया और उनके साहस तथा मुख्यधारा में लौटने के निर्णय की सराहना की। मुख्यमंत्री ने महिलाओं का उत्साह बढ़ाते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद दिया।
पहली बार राजधानी रायपुर पहुंची इन महिलाओं के लिए यह अवसर बेहद खास और यादगार रहा। मुख्यमंत्री से सीधे संवाद और प्रदेश स्तरीय मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अनुभव उनके लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित हुआ।
7 दिनों की ट्रेनिंग ने बदला अंदाज

इस विशेष प्रस्तुति को सफल बनाने के लिए मुंबई से आए पेशेवर विशेषज्ञों ने इन महिलाओं को लगातार 7 दिनों तक रैंप वॉक, ग्रूमिंग, वेशभूषा और मंच पर माइक के माध्यम से आत्मविश्वास के साथ बोलने का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को न केवल मंच पर चलने और प्रस्तुति देने की बारीकियां सिखाई गईं, बल्कि सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने का आत्मविश्वास भी विकसित किया गया।
पुनर्वास नीति का दिखा मानवीय चेहरा
आत्मसमर्पण के बाद इन महिलाओं को केवल हिंसा से दूर लाना ही उद्देश्य नहीं रहा, बल्कि उन्हें सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन देने की दिशा में भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कौशल विकास, प्रशिक्षण और रोजगारोन्मुख गतिविधियों के माध्यम से पुनर्वासित युवाओं को समाज में अपनी नई पहचान बनाने का अवसर मिल रहा है।
रैंप पर कोसा सिल्क के पारंपरिक परिधानों में मुस्कुराती इन महिलाओं ने यह संदेश दिया कि सही अवसर और संवेदनशील सहयोग मिले तो जीवन की दिशा बदली जा सकती है।
बदलते बस्तर की नई पहचान
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मंच पर आत्मसमर्पित महिलाओं की यह प्रस्तुति बस्तर के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आई। जिन कदमों ने कभी जंगलों में हिंसा और भय की राह देखी थी, वही कदम आज आत्मविश्वास के साथ रैंप पर चलकर छत्तीसगढ़ की समृद्ध हथकरघा परंपरा का गौरव प्रस्तुत कर रहे थे।
यह दृश्य केवल एक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि बदलते बस्तर की उस नई कहानी का प्रतीक था, जहां बंदूक की जगह हुनर, हिंसा की जगह विकास और भय की जगह आत्मविश्वास ले रहा है।
आत्मसमर्पण से लेकर मंच की सुर्खियों तक का यह सफर बताता है कि पुनर्वास केवल किसी व्यक्ति को मुख्यधारा में वापस लाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसे सम्मान, पहचान, आत्मनिर्भरता और बेहतर भविष्य का अवसर देने का संकल्प भी है।
रायपुर के इस मंच पर सुकमा की इन आत्मसमर्पित महिलाओं ने अपने आत्मविश्वास से यही संदेश दिया कि बस्तर की बेटियां अब केवल संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि बदलाव, हुनर और नई उम्मीद की पहचान भी बन रही हैं।

Rajdhani Se Janta Tak
Author: Rajdhani Se Janta Tak

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