राजधानी से जनता तक कोरबा | विशेष लेख|(संगम दुबे)
सुबह के करीब पांच बजे का वक्त था।
कटघोरा वनमंडल के केंदई इलाके के पतरियाडांड गांव की 70 वर्षीय सुखमत बाई रोज की तरह जंगल की ओर निकली थीं। महुआ बीनना उनके लिए कोई असामान्य काम नहीं था। जंगल उनके लिए सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं था, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
लेकिन 24 जून 2026 की सुबह उनके लिए आखिरी सुबह साबित हुई।जंगल में उनका सामना हाथी से हुआ और हमले में उनकी मौत हो गई।कुछ ही दिन बाद, 10 जुलाई को कोरबा के पिड़िया गांव के 55 वर्षीय जहाज सिंह राठिया भी हाथी की चपेट में आ गए। वे जंगल में मशरूम और महुआ लेने गए थे।
मार्च 2026 में कुदमुरा के धान खरीदी केंद्र में भी हाथी के हमले में एक व्यक्ति की मौत हुई थी। रात करीब दो बजे हाथी वहां पहुंचा था। केंद्र में बड़ी मात्रा में धान रखा था।
इन तीन घटनाओं को अलग-अलग हादसों की तरह पढ़ा जा सकता है। लेकिन जब इन्हें कोरबा के पिछले कुछ वर्षों के मानव-हाथी संघर्ष के संदर्भ में देखा जाता है, तो तस्वीर कहीं ज्यादा गंभीर दिखाई देती है।
तब सवाल सिर्फ इतना नहीं रह जाता कि हाथी गांव तक क्यों पहुंच रहा है।
सवाल यह बनता है कि उसके लिए जंगल में रास्ता कितना बचा है?
कोरबा में कहानी सिर्फ ‘हाथियों के आतंक’ की नहीं है
कोरबा को आमतौर पर कोयला, बिजली और उद्योगों के जिले के रूप में देखा जाता है।
कोयला खदानें हैं। बिजली संयंत्र हैं। एल्युमिनियम उद्योग है। सड़कें और रेल लाइनें हैं। इनके आसपास लगातार फैलती बस्तियां भी हैं।
लेकिन कोरबा का एक दूसरा भूगोल भी है, घने जंगलों का भूगोल।
लेमरू से लेकर कुदमुरा और बालको के आसपास के वन क्षेत्रों तक फैला यह इलाका वन्यजीवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हाथियों की आवाजाही भी इसी बड़े landscape का हिस्सा है।
कभी एक झुंड गांव के करीब दिखाई देता है। कभी अकेला नर हाथी कई किलोमीटर तक घूमता हुआ पहुंच जाता है। कहीं खेतों में फसल रौंद दी जाती है, तो कहीं घरों को नुकसान पहुंचता है।
और जब हाथी आबादी के करीब आता है, तो हमारी खबरों में एक शब्द बहुत तेजी से दिखाई देता है..
‘आतंक’
लेकिन जंगल के नजरिए से शायद कहानी इतनी सीधी नहीं है।
हाथी किसी गांव की सीमा देखकर अपना रास्ता नहीं बदलता। उसे यह मालूम नहीं होता कि यहां से राजस्व गांव शुरू हो गया है, आगे सड़क है या सामने किसी कंपनी की जमीन।
वह उस भू-दृश्य के हिसाब से चलता है जिसे उसने अपने जीवन में सीखा है।
यहीं से टकराव शुरू होता है।
लेमरू को सिर्फ एक ‘रिजर्व’ समझना पर्याप्त नहीं
कोरबा में हाथियों की कहानी लेमरू के बिना अधूरी है।
शासन द्वारा लेमरू एलिफेंट रिजर्व अधिसूचित किया गया था। इसका क्षेत्रफल लगभग 1,995.48 वर्ग किलोमीटर बताया गया है और इसका भू-दृश्य कोरबा के साथ-साथ कटघोरा, सरगुजा और धरमजयगढ़ के वन क्षेत्रों से जुड़ता है।
इन जंगलों में साल और मिश्रित पर्णपाती वन पाए जाते हैं। लेकिन हाथी के लिए जंगल की अहमियत सिर्फ पेड़ों की संख्या से तय नहीं होती।
उसे पानी चाहिए।भोजन चाहिए।सुरक्षित रास्ते चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण,एक ऐसे landscape की जरूरत होती है जिसमें वह एक जंगल से दूसरे जंगल तक जा सके।
यही वजह है कि हाथियों के संरक्षण की चर्चा अब सिर्फ ‘कितना जंगल बचा’ तक सीमित नहीं रह सकती।
यह भी देखना होगा कि जो जंगल बचा है, क्या वह आपस में जुड़ा हुआ है?
क्योंकि एक बड़ा लेकिन टूटा हुआ जंगल, हाथी के लिए उतना उपयोगी नहीं हो सकता जितना कई हिस्सों में जुड़ा हुआ प्राकृतिक (परिदृश्य )landscape..
हाथी रास्ता याद रखता है, हम रास्ता बदल देते हैं, हाथियों की याददाश्त को लेकर लंबे समय से वैज्ञानिक अध्ययन होते रहे हैं। वे पानी के स्रोत, भोजन वाले क्षेत्र और अपने landscape में मौजूद रास्तों को लंबे समय तक याद रख सकते हैं।
इसीलिए किसी इलाके में कुछ वर्षों के भीतर सड़क, बस्ती, खनन क्षेत्र या दूसरी मानव गतिविधि आ जाने से हाथी के लिए वह पुराना रास्ता अचानक खत्म नहीं हो जाता।
हमारे नक्शे पर जमीन का इस्तेमाल बदल जाता है।हाथी की स्मृति में शायद नहीं।और यही फर्क धीरे-धीरे conflict(संघर्ष ) में बदलता है।
आज जिस रास्ते पर खेत है, संभव है कभी वहां से हाथियों की आवाजाही होती रही हो। जिस जगह अब सड़क है, वहां कभी जंगल का निरंतर हिस्सा रहा हो।
इसका मतलब यह नहीं कि हर मानव-हाथी संघर्ष का कारण सिर्फ विकास परियोजना है। जंगल के भीतर भोजन-पानी की उपलब्धता, मौसम, हाथियों की संख्या, फसल का आकर्षण और कई दूसरे कारण भी भूमिका निभाते हैं।
लेकिन habitat fragmentation(आवास विखंडन) इस संघर्ष को समझने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है।
मौतों का सिलसिला एक गंभीर संकेत है
दिसंबर 2025 में कोरबा के गौरेबोरा गांव में एक अकेले नर हाथी के हमले में 35 वर्षीय महेंद्र सिंह की मौत हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार इसी हाथी के हमले में इससे पहले दो महिलाओं की भी जान जा चुकी थी।
2026 में भी घटनाएं सामने आती रहीं।मार्च में कुदमुरा।जून में पतरियाडांड।इसके बाद जटगा क्षेत्र से भी ग्रामीण की मौत की खबर सामने आई।और जुलाई में पिड़िया गांव में जहाज सिंह राठिया की मौत।
हर घटना के पीछे अलग परिस्थितियां रही होंगी। कहीं जंगल में जाना वजह बना, कहीं रात के समय हाथी आबादी के करीब पहुंचा।
इसलिए इन घटनाओं को सिर्फ आंकड़ों की तरह देखना ठीक नहीं होगा।
हर आंकड़े के पीछे एक परिवार है।
एक घर है।
एक ऐसी आजीविका है जो अचानक रुक जाती है।
और एक गांव है, जहां अगली रात लोग यह सोचकर सोते हैं कि हाथी फिर आएगा या नहीं।
हाथी भी इस संघर्ष की कीमत चुका रहा है
मानव-हाथी संघर्ष की चर्चा में अक्सर इंसानी नुकसान सामने रहता है और रहना भी चाहिए।
लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा भी है।
फसलें रौंदी जाती हैं, घरों को नुकसान होता है और कई बार हाथी भी बिजली के तार, सड़क दुर्घटनाओं या दूसरे मानवजनित खतरों का शिकार होते हैं।
यानी संघर्ष में किसी एक पक्ष की जीत नहीं होती।
इंसान असुरक्षित होता है।
हाथी भी असुरक्षित होता है, हाथियों की भी मौत होती हैं।
और जंगल का ecological balance भी प्रभावित होता है।
यही वजह है कि इसे सिर्फ ‘हाथी बनाम इंसान’ की लड़ाई के रूप में देखना समस्या को बहुत छोटा कर देता है।
असल सवाल है, दोनों के लिए जगह और सुरक्षित आवाजाही कैसे सुनिश्चित की जाए?
देश में हाथियों की संख्या बढ़ी, लेकिन चुनौती भी बड़ी हुई
भारत में हाथियों के संरक्षण को लेकर पिछले वर्षों में कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं।
2025 में भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने पहली बार DNA आधारित समकालिक हाथी जनसंख्या आकलन किया। इस अध्ययन में भारत में लगभग 22,446 जंगली हाथियों का अनुमान सामने आया।
भारत दुनिया की जंगली एशियाई हाथी आबादी का एक बड़ा हिस्सा संभालता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है।
सिर्फ हाथियों की गिनती बढ़ना संरक्षण की पूरी कहानी नहीं है।
अगर हाथियों के रहने और घूमने के लिए जरूरी habitat लगातार छोटे और अलग-अलग हिस्सों में बंटता गया, तो केवल संख्या बचाने से समस्या खत्म नहीं होगी।
इसीलिए पिछले वर्षों में Elephant Reserves और elephant corridors पर भी जोर बढ़ा है।
2014 में देश में 26 Elephant Reserves थे। 2025-26 तक इनकी संख्या 33 बताई गई है। इसी तरह 2010 में चिन्हित 88 elephant corridors की संख्या 2023 में 150 तक पहुंचने की जानकारी सरकार ने दी है।
यह बदलाव अपने आप में एक संकेत है।
अब संरक्षण की सोच सिर्फ जंगल की सीमा तय करने तक सीमित नहीं रही।
अब सवाल यह है कि उस जंगल के बीच जानवरों की आवाजाही कैसे सुरक्षित रखी जाए।
लेमरू में असली चुनौती नक्शे और जमीन के बीच का फर्क है
किसी कागज पर corridor बनाना अपेक्षाकृत आसान है।
लेकिन जमीन पर उसी corridor की स्थिति क्या है , यह महत्वपूर्ण सवाल है।
क्या वहां खेत हैं?, क्या गांव बस चुके हैं?, क्या सड़क गुजरती है?, क्या बिजली की लाइन है, क्या खनन गतिविधि है?,क्या कोई औद्योगिक परियोजना प्रस्तावित है?,और अगर इन सबके बीच से हाथी गुजरता है तो उसके लिए सुरक्षित विकल्प क्या है?
यहीं से conservation (संरक्षण) की असली परीक्षा शुरू होती है।
क्योंकि हाथी को यह नहीं बताया जा सकता कि ‘आपका corridor(कॉरिडोर )इस नक्शे पर है, इसलिए इसी रास्ते से जाइए।’
वह उपलब्ध रास्ते से जाएगा।
और अगर उपलब्ध रास्ता इंसानी बस्ती से होकर निकलता है, तो conflict की संभावना बढ़ेगी।
कोरबा को ‘विकास बनाम पर्यावरण’ की पुरानी बहस से आगे जाना होगा
कोरबा में विकास जरूरी है।
यहां उद्योग हैं, रोजगार है, ऊर्जा उत्पादन है और बड़ी आबादी की रोजमर्रा की जरूरतें इन गतिविधियों से जुड़ी हैं।
दूसरी तरफ जंगल भी जरूरी हैं।
वन पर निर्भर समुदायों की आजीविका उनसे जुड़ी है। वन्यजीवों का अस्तित्व उनसे जुड़ा है। पानी और स्थानीय पर्यावरण भी उनसे जुड़े हैं।
इसलिए बहस को सिर्फ दो खानों में बांटना आसान है
विकास चाहिए या जंगल?
असल चुनौती इससे आगे है।
क्या सड़क ऐसी बनाई जा सकती है जिसमें wildlife movement(वन्य जीव आंदोलन) को ध्यान में रखा जाए?
क्या संवेदनशील क्षेत्रों में बिजली लाइनों की डिजाइन और सुरक्षा पर दोबारा विचार किया जा सकता है?
क्या गांवों में elephant early-warning system ज्यादा भरोसेमंद बनाया जा सकता है?
क्या महुआ, तेंदूपत्ता और दूसरे forest produce के मौसम में ग्रामीणों को विशेष सुरक्षा सूचना दी जा सकती है?
क्या हाथियों की लोकेशन से जुड़ी सूचना समय रहते गांव तक पहुंच सकती है?
और क्या महत्वपूर्ण corridors को भविष्य की परियोजनाओं की planning में पहले से ध्यान में रखा जाएगा?
ये सवाल सिर्फ वन विभाग के नहीं हैं।
ये पूरे जिले की planning से जुड़े सवाल हैं।
हाथी को जंगल में वापस भेजना समाधान का सिर्फ पहला कदम है
जब कोई हाथी गांव में पहुंचता है तो तत्काल चुनौती साफ होती है, लोगों को सुरक्षित करना और हाथी को बिना नुकसान के वापस जंगल की ओर ले जाना।
लेकिन अगर वही हाथी बार-बार उसी क्षेत्र में लौट रहा है, तो केवल उसे भगाना स्थायी समाधान नहीं है।
तब देखना होगा कि वह वहां क्यों आ रहा है।, क्या रास्ता बदल गया है?
क्या जंगल में भोजन-पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है?
क्या आसपास की फसलें उसे आकर्षित कर रही हैं?
क्या कोई पुराना movement route बाधित हुआ है?
क्या आसपास मानव गतिविधियां बढ़ी हैं?
यानी management(प्रबंध )के साथ रिसर्च भी जरूरी है।
और यह काम एक गांव की सीमा में नहीं किया जा सकता।
हाथी प्रशासनिक सीमा नहीं समझता।
इसलिए उसकी conservation planning भी केवल एक जिले या एक वन परिक्षेत्र की सीमा में नहीं रुकनी चाहिए।
खबरों की भाषा भी बदलनी होगी
‘हाथियों का आतंक।’, ‘हाथियों का कहर।’ ‘दहशत में गांव।’
ऐसी शब्द घटना की गंभीरता तुरंत सामने रखती हैं। लेकिन अगर हर कहानी में हाथी सिर्फ एक ‘खतरनाक जानवर’ बनकर दिखाई देगा, तो उसके पीछे की ecological कहानी धीरे-धीरे गायब हो जाएगी।
ग्रामीणों का डर वास्तविक है।
हाथी के हमले में मौत भी वास्तविक है।
लेकिन habitat fragmentation, जंगलों का बदलता स्वरूप और movement corridors की समस्या भी वास्तविक है।
क्योंकि यह कहानी सिर्फ हाथी की नहीं है।
यह जमीन की कहानी है। उस जमीन के इस्तेमाल की कहानी है।और उस बदलते भूगोल की कहानी है, जिसमें इंसान और हाथी दोनों को अपना रास्ता तलाशना पड़ रहा है।
विश्व हाथी दिवस पर सवाल सिर्फ संरक्षण का नहीं, सह-अस्तित्व का है
12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है।
इस दिन हाथियों के सामने मौजूद खतरों पर दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश की जाती habitat loss, human-elephant conflict, अवैध शिकार और captive elephants की welfare जैसे मुद्दे इसके केंद्र में रहे हैं।
भारत में हाथी सिर्फ वन्यजीव नहीं है।, वह हमारी संस्कृति का हिस्सा है।लेकिन जंगल में उसके लिए जगह बचाना उस सांस्कृतिक सम्मान से अलग नहीं होना चाहिए।अगर हम उसे ‘गजराज’ कहते हैं, तो उसके चलने के लिए रास्ता भी बचाना होगा।
कोरबा के जंगल से निकलता सवाल
कल्पना कीजिए।
एक तरफ कोयले और बिजली पर टिकी अर्थव्यवस्था है।
दूसरी तरफ जंगल में चलता एक हाथी है।
एक तरफ किसान है, जिसकी फसल उसके परिवार की आय है।
दूसरी तरफ हाथी है, जिसके लिए वही फसल आसान भोजन बन सकती है।
एक तरफ गांव को सड़क चाहिए।
दूसरी तरफ उसी landscape से हाथियों को गुजरना है।दोनों गलत नहीं हैं।
लेकिन जब दोनों की जरूरतें एक ही जगह पर टकराती हैं, तो संघर्ष पैदा होता है।
इसलिए विश्व हाथी दिवस पर कोरबा से सबसे जरूरी सवाल शायद यह नहीं है कि
‘हाथियों को कैसे बचाएं?’
सवाल इससे थोड़ा बड़ा है..
‘ऐसा landscape कैसे बचाएं जिसमें हाथी भी सुरक्षित रह सके और इंसान भी?’
क्योंकि जंगल में रास्ते कम होंगे, तो हाथी रास्ता बदलेगा।
और बदला हुआ रास्ता कभी खेत तक पहुंचेगा, कभी सड़क तक और कभी किसी इंसान के घर तक।
कोरबा की कहानी इसलिए हाथी बनाम इंसान की कहानी नहीं है।
यह उस बदलते भूगोल की कहानी है, जहां दोनों एक ही landscape में रह रहे हैं, और जहां आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि किसी एक को बचाने के लिए दूसरे को खतरे में न डालना पड़े। फ़िलहाल प्रशासन युद्धस्तर पर हाथी मानव द्वंद को रोकने के प्रयास में जुटा हुआ है। देखना होगा की बदलते वानिकी संरचना के साथ हाथियों और इंसान के बीच का संघर्ष कैसे कम किया जा सकेगा।
Author: Sangam Dubey
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