सुशासन तिहार पर उठे तीखे सवाल, सुंदरपुर शिविर में प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व का साया, लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बहस तेज।

निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति और गैर-निर्वाचित चेहरों की सक्रियता ने खड़े किए कई गंभीर प्रश्न।

मोहन प्रताप सिंह

राजधानी से जनता तक, सूरजपुर/भैयाथान:– छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रदेशभर में आयोजित किए जा रहे सुशासन तिहार का उद्देश्य शासन को आम जनता के करीब लाना, जनसमस्याओं का त्वरित निराकरण करना तथा प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। लेकिन जनपद पंचायत भैयाथान अंतर्गत ग्राम पंचायत सुंदरपुर में आयोजित सुशासन तिहार शिविर से सामने आए घटनाक्रमों ने इस पूरे अभियान की प्रभावशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, सुंदरपुर में आयोजित शिविर में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा उनके परिजनों और समर्थकों की सक्रियता अधिक दिखाई दी। कई ऐसे चेहरे मंच और प्रशासनिक गतिविधियों के केंद्र में नजर आए, जिन्हें जनता ने प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित नहीं किया है। प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को विशेष महत्व और तवज्जो दिए जाने की चर्चाएं क्षेत्र में तेज हो गई हैं।

जनादेश किसके नाम और प्रतिनिधित्व किसका?

सुशासन तिहार के तहत आयोजित शिविरों, जनसुनवाई, प्रशासनिक बैठकों और सार्वजनिक आयोजनों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति, भाई, पुत्र अथवा अन्य परिजनों की सक्रिय मौजूदगी को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। सुंदरपुर का मामला सामने आने के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि आखिर जनता द्वारा दिए गए जनादेश का वास्तविक प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव इस विश्वास के साथ करता है कि वही व्यक्ति जनता की समस्याओं को सुनेगा, प्रशासन के समक्ष उनकी आवाज़ उठाएगा और विकास कार्यों की निगरानी करेगा। ऐसे में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति और उनके स्थान पर गैर-निर्वाचित व्यक्तियों की सक्रियता लोगों के बीच असंतोष और चर्चा का विषय बनती जा रही है।

महिला आरक्षण की भावना पर भी उठे सवाल

यह घटनाक्रम पंचायतों और नगरीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू आरक्षण व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिजन सार्वजनिक कार्यक्रमों और बैठकों में भूमिका निभाते दिखाई दें, तो महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक सहभागिता के मूल उद्देश्य पर बहस स्वाभाविक हो जाती है।

प्रशासनिक भूमिका भी चर्चा के घेरे में

इस पूरे मामले में जनपद पंचायत क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को जनप्रतिनिधियों के समान मंचीय महत्व और प्रोटोकॉल दिया जा रहा है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या यह प्रशासनिक सुविधा का मामला है, सामाजिक या राजनीतिक दबाव का परिणाम है, अथवा समय के साथ विकसित हुई ऐसी परंपरा, जिसे नियमों के विपरीत होने के बावजूद अनदेखा किया जाता रहा है?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकार, दायित्व और प्रोटोकॉल सामान्यतः उसी व्यक्ति के लिए निर्धारित होते हैं, जिसे जनता ने निर्वाचित किया हो। ऐसे में गैर-निर्वाचित व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी और उन्हें जनप्रतिनिधियों के समान महत्व दिए जाने को लेकर सार्वजनिक बहस तेज होना स्वाभाविक माना जा रहा है। हालांकि, यदि किसी विशेष परिस्थिति में अधिकृत प्रतिनिधित्व का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान मौजूद हो, तो स्थिति अलग हो सकती है।

सुशासन कहीं प्रचार तक सीमित तो नहीं?

आलोचकों का कहना है कि यदि सुशासन तिहार केवल मंचीय कार्यक्रमों, फोटो सेशन, रील और प्रचार-प्रसार तक सीमित रह गया, तो आम जनता की वास्तविक समस्याएं पीछे छूट जाएंगी। लोगों की अपेक्षा है कि शिविरों में उनकी शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो, योजनाओं का लाभ पात्र हितग्राहियों तक पहुंचे और जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि स्वयं उपस्थित होकर अपनी जवाबदेही निभाएं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुशासन केवल आयोजनों और प्रचार-प्रसार से स्थापित नहीं होता, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही, संवेदनशील प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष भागीदारी से ही उसकी सार्थकता सिद्ध होती है।

सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम

सुंदरपुर में आयोजित सुशासन तिहार शिविर के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह अभियान वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करने, जनता का विश्वास जीतने और शासन को जवाबदेह बनाने का माध्यम बनेगा, या फिर यह उस प्रॉक्सी जनप्रतिनिधित्व की संस्कृति को उजागर करेगा, जिसमें जनादेश किसी और के नाम पर होता है और उसकी भूमिका कोई और निभाता है।

प्रदेश की जनता अब इन सवालों के जवाब भाषणों और मंचीय आयोजनों में नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव, जनसमस्याओं के समाधान और अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष भागीदारी के रूप में देखना चाहती है। लोकतंत्र की वास्तविक ताकत भी तभी सिद्ध होगी, जब जनता का विश्वास केवल नारों से नहीं, बल्कि जवाबदेह और सहभागी शासन व्यवस्था से मजबूत होगा।

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