आर्द्रभूमि संरक्षण में जनभागीदारी को मिलेगा बढ़ावा

रायपुर, 11 जून 2026 / आर्द्रभूमियां हमारी प्रकृति का सबसे उत्पादक और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हें अक्सर प्रकृति के गुर्दे या जैविक सुपरमार्केट कहा जाता है, क्योंकि ये पर्यावरण और मानव जीवन के लिए कई अनमोल सेवाएं प्रदान करते हैं। ये क्षेत्र वनस्पतियों और जीवों की हजारों प्रजातियों (विशेषकर प्रवासी पक्षियों, उभयचरों और मछलियों) का प्रमुख प्राकृतिक आवास हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन के लिए ये बेहद जरूरी हैं। छत्तीसगढ़ में आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) के संरक्षण और सतत प्रबंधन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से रायपुर में राज्य स्तरीय परामर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी (एफईएस) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न विभागों, पंचायत प्रतिनिधियों, शोध संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों तथा समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया।

आर्द्रभूमियां जल, जैव विविधता और आजीविका की आधारशिला

कार्यक्रम का उद्घाटन छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के सदस्य सचिव श्री मथेश्वरन वी. (आईएफएस) ने किया। उन्होंने कहा कि आर्द्रभूमियां जल संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और स्थानीय आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। राज्य में आर्द्रभूमियों की जियो टैगिंग, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और रामसर स्थलों की पहचान जैसे कार्यों में नागरिकों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण रही है।

जल प्रबंधन में ‘रिज टू वैली’ दृष्टिकोण की आवश्यकता

एफईएस की अध्ययन प्रमुख प्रतीति प्रियदर्शिनी ने जल शासन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जल को साझा प्राकृतिक संसाधन मानकर पूरे परिदृश्य स्तर पर प्रबंधन की आवश्यकता है। उन्होंने जल संरक्षण से जुड़े संस्थानों को और अधिक मजबूत एवं समन्वित बनाने पर जोर दिया।

सहभागिता से साझेदारी की ओर बढ़ने का समय

मुख्य वक्ता एवं मनरेगा आयुक्त ने कहा कि आर्द्रभूमियों के महत्व को सरल भाषा में गांव-गांव तक पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि समुदायों को केवल सहभागी नहीं, बल्कि संरक्षण कार्यों का भागीदार बनाना होगा। जलदूत, क्लार्ट (CLART) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग से जल प्रबंधन को और प्रभावी बनाया जा सकता है।

स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

कार्यक्रम में प्रस्तुत अध्ययन निष्कर्षों में बताया गया कि आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए जैव विविधता, जल गुणवत्ता और मानवीय उपयोग के बीच संतुलन आवश्यक है। विशेषज्ञों ने कहा कि स्थानीय समुदायों को जल गुणवत्ता निगरानी और जैव विविधता संरक्षण से जोड़ने पर बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे। पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री आर.के. सिंह ने ग्राम पंचायतों और जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) की भूमिका को सशक्त बनाने पर जोर दिया। उन्होंने ग्राम पंचायत विकास योजनाओं को सतत विकास लक्ष्यों और जल संरक्षण संकेतकों से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

गांवों में बढ़ रही संरक्षण की जागरूकता

रायपुर जिले की टोर, बरबंदा, मांढर और गोधी ग्राम पंचायतों के सरपंचों एवं स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि जागरूकता बढ़ने के बाद ग्राम सभाओं में आर्द्रभूमि संरक्षण संबंधी नियम बनाए जा रहे हैं और स्थानीय स्तर पर संरक्षण गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है।

आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए प्रमुख सुझाव

परामर्श कार्यक्रम में विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें प्रमुख रूप से राज्य की प्रमुख आर्द्रभूमियों का अद्यतन मानचित्रण और दस्तावेजीकरण, संरक्षण एवं प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की औपचारिक भागीदारी, महिलाओं और युवाओं को नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान करना,जल गुणवत्ता और जैव विविधता निगरानी में नागरिक विज्ञान को बढ़ावा देना, आर्द्रभूमि आधारित आजीविका के अवसर विकसित करना, ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं को अधिक सशक्त बनाना, विभिन्न विभागों के बीच समन्वित कार्ययोजना तैयार करना और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियों में आर्द्रभूमि संरक्षण को शामिल करना है। पंचायतों के लिए सरल हिंदी में मार्गदर्शिका और मॉनिटरिंग दस्तावेज तैयार करना।

सतत संरक्षण के लिए जारी रहेगा संवाद

कार्यक्रम के समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि राज्य में आर्द्रभूमियों के संरक्षण और सामुदायिक नेतृत्व आधारित प्रबंधन को मजबूत बनाने के लिए ऐसे संवाद नियमित रूप से आयोजित किए जाएंगे। साथ ही ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों के लिए सरल एवं व्यवहारिक हिंदी में उपयोगी सामग्री विकसित की जाएगी, ताकि जनभागीदारी के माध्यम से जल और जैव विविधता संरक्षण को नई दिशा मिल सके।

Rajdhani Se Janta Tak
Author: Rajdhani Se Janta Tak

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