कागजों पर लबालब, खेत में धूल: गरियाबंद में 150 करोड़ का ‘सूखा’ घोटाला! PMO पहुंची शिकायत

गरियाबंद/देवभोग:छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के देवभोग क्षेत्र में जल संसाधन विभाग ने ‘विज्ञान और जल-प्रबंधन’ का ऐसा नायाब नमूना पेश किया है, जिसे देखकर दुनिया के बड़े से बड़े इंजीनियर भी अपना माथा पीट लें। कागज पर सैकड़ों किलोमीटर लंबी नहरें दौड़ रही हैं, करोड़ों के बजट का पानी की तरह ‘बहाव’ हो चुका है, लेकिन धरातल पर किसानों के हिस्से आई है तो सिर्फ सूखी मिट्टी और धूल!

आरटीआई (RTI) से निकले दस्तावेजों ने जल संसाधन विभाग की ‘कागजी हरियाली’ की कलई खोलकर रख दी है। ग्राम गिरसुल निवासी कन्हैया मांझी द्वारा उजागर किए गए इस 150 करोड़ रुपये से अधिक के भव्य ‘सूखे घोटाले’ की गूंज अब सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), नई दिल्ली तक पहुंच गई है।

गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देता ‘इंजीनियरिंग का अजूबा

विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने निर्माण के नाम पर ऐसी ‘अद्भुत’ कलाकृतियां बनाई हैं कि पानी खुद रास्ता भूल जाए:अमाड डाइवर्जन योजना (लगभग ₹20 करोड़): 5,000 एकड़ खेत सिंचने के दावे के साथ बनी इस योजना में एनीकट की ऊंचाई 10 फीट रखी गई है और नहर को 20 फीट ऊपर बना दिया गया है! शायद अधिकारियों को उम्मीद थी कि पानी गुरुत्वाकर्षण के नियमों को तोड़कर 10 फीट हवा में उछलकर नहर में खुद-ब-खुद तैरने लगेगा।

उरमाल जलप्लावन योजना (लगभग ₹77.38 करोड़): बिना एनीकट (बांध) बनाए ही 29 किलोमीटर लंबी नहर खोद दी गई! यानी पानी रोकने का कोई इंतजाम नहीं, बस नहर बनाकर बजट ‘ठिकाने’ लगा दिया गया।अमलीपदर एनीकट व नहर (₹30 करोड़): 30 करोड़ स्वाहा होने के बाद भी नहरें जर्जर हैं और किसान बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं।

रताखण्ड (₹26.06 करोड़), चलनापदर (₹9.80 करोड़) एवं बरही (₹2 करोड़): ये योजनाएं फाइलों में “शत-प्रतिशत सफल” और पूर्ण घोषित हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन पर खर्च हुआ पैसा सीधे ठेकेदारों और अफसरों की जेब में ‘सिंचित’ हो गया।

जमीन भी छिनी, मुआवजा भी गायब!

घोटाले की पराकाष्ठा यह है कि जिन गरीब आदिवासी किसानों की उपजाऊ जमीनें इन ‘शो-पीस’ नहरों के लिए अधिग्रहित की गईं, उन्हें आज तक मुआवजे का एक रुपया नसीब नहीं हुआ। यानी किसानों की जमीन भी गई, फसल भी सूखी और सरकारी फाइलों में वे ‘लाभांवित’ भी दर्ज हो गए!

 

राज्य में ‘अंधेर नगरी अब PMO से न्याय की आस

शिकायतकर्ता के अनुसार, कलेक्टर से लेकर चीफ इंजीनियर और मुख्यमंत्री सचिवालय तक दो-दो बार लिखित शिकायतें भेजी गईं, लेकिन सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूटी। विभागीय ‘सांठ-गांठ’ का आलम यह रहा कि शिकायतों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया।

स्थानीय जांच के नाम पर होने वाले ‘लीपापोती खेल’ से तंग आकर अब सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई गई है।

शिकायतकर्ता और ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

सीधे दिल्ली से जांच:जांच दल केंद्र सरकार का हो, ताकि स्थानीय ‘सांठ-गांठ’ वाले अफसर मामले को दबा न सकें।

जेल भेजें या CBI को सौंपें

कागजों पर फर्जी ‘पूर्णता प्रमाणपत्र’ बांटने वाले कार्यपालक अभियंताओं, तकनीकी सलाहकारों और ठेकेदारों पर आपराधिक FIR दर्ज हो। मामला CBI या लोकायुक्त को सौंपा जाए।तत्काल मुआवजा: छले गए आदिवासी किसानों को अधिग्रहित भूमि का लंबित मुआवजा और वैकल्पिक सिंचाई तुरंत दी जाए।

150 करोड़ रुपये डकारने के बाद अब देखना यह है कि PMO के दखल के बाद क्या इस ‘कागजी जलपरी’ का सच सामने आएगा या फाइलों में पानी बहता रहेगा!

Rajdhani Se Janta Tak
Author: Rajdhani Se Janta Tak

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