
गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के आदिवासी बहुल विकासखंड मैनपुर स्थित ग्राम खोलापारा (ग्राम पंचायत दबनई) से सरकारी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही की एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। यहां का शासकीय प्राथमिक स्कूल भवन वर्षों से अत्यंत जर्जर होकर ढहने की कगार पर पहुंच चुका है। हादसों के डर से स्कूल को पास ही स्थित एक छोटे से आंगनबाड़ी केंद्र में स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन यह व्यवस्था राहत के बजाय मासूम बच्चों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गई है।
10 फीट के एक ही कमरे में ठूंसी जा रहीं 6 कक्षाएं।
वर्तमान में केवल 10 फीट के एक संकरे कमरे के भीतर आंगनबाड़ी के 22 मासूम नौनिहालों के साथ-साथ प्राथमिक शाला खोलापारा की कक्षा 1 से 5 तक के सभी छात्र-छात्राओं को एक साथ बिठाकर पढ़ाया जा रहा है। एक ही छत के नीचे, एक ही समय पर आंगनबाड़ी के छोटे बच्चों का रोना-गाना और प्राथमिक स्कूल की पांचों कक्षाओं का अध्यापन एक साथ होने से कमरे में भयंकर शोर और घुटन की स्थिति बनी रहती है।
कमरा इतना छोटा है कि बच्चों को फर्श पर बैठने तक के लिए जगह बमुश्किल मिलती है। इसके अलावा, शुद्ध पेयजल और चालू शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के न होने से बच्चे रोजाना घंटों शारीरिक और मानसिक कष्ट सहने को विवश हैं।
‘विशेष पिछड़ी जनजाति’ कमार के नौनिहालों से खिलवाड़
ग्राम खोलापारा मुख्य रूप से राज्य की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) ‘कमार’ जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है। सरकारें राजधानी के वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस जनजाति के संरक्षण, विकास और ‘पीएम-जनमन’ जैसी योजनाओं के तहत ढांचागत सुधार के बड़े-बड़े दावे करती हैं। लेकिन धरातल पर गरीब और मजदूर आदिवासी परिवारों के पास अपने बच्चों को इसी कुव्यवस्था के हवाले करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा है।
फाइलों में दफ्न हुई फरियाद, ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी
ग्राम पंचायत दबनई की सरपंच रमशिला बाई नेताम और जनपद सदस्य प्रताप मरकाम ने बताया कि नए स्कूल भवन के निर्माण की मांग को लेकर वे विकासखंड शिक्षा कार्यालय (BEO) में कई बार ज्ञापन सौंप चुके हैं। लेकिन प्रशासनिक बेरुखी का आलम यह है कि इन आवेदनों का समाधान करना तो दूर, इन्हें उच्च कार्यालयों तक भेजने की जहमत तक नहीं उठाई गई।
‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ का नारा देने वाला विभाग इन आदिवासी बच्चों के भविष्य और जान-माल से खिलवाड़ कर रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जिम्मेदार अधिकारी शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही नए भवन का निर्माण या समुचित वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, तो वे उग्र आंदोलन की राह पकड़ने के लिए बाध्य होंगे।





