20 साल का तप, 4 महीने का पतन: मैनपुर के ‘भ्रष्टाचारी पुल’ पर प्रशासन मौन, जनता हैरान!

गरियाबंद/मैनपुर :
भाई वाह! इसे कहते हैं विकास की वह ‘सुपरफास्ट’ रफ्तार, जहां जनता 20 साल तक जूते घिसती रहे, आंदोलन करे, चक्का जाम करे, तब जाकर कहीं सरकार का दिल पसीजे और एक पुल नसीब हो। लेकिन साहब, इस देश के भ्रष्टाचारियों का टैलेंट भी किसी अजूबे से कम नहीं है। जिस पुल को बनाने में जनता को दो दशक का लंबा वनवास झेलना पड़ा, उस पुल ने उद्घाटन के महज चार महीने के भीतर ही ऐसा चमत्कार दिखाया कि भगवान विश्वकर्मा भी सिर पीट लें!
करोड़ों रुपये की लागत से बने इस नवनिर्मित पुल के एप्रोच रोड ने अचानक ऐसा ‘धमाकेदार’ स्वागत किया कि सड़क के नीचे सीधे सुरंगनुमा गहरा गड्ढा बन गया। इसे कहते हैं तकनीक का अद्भुत मेल—ऊपर से चमचमाती सड़क, और अंदर से पोलैंड जैसी भूमिगत सुरंगे! लगता है ठेकेदार और इंजीनियरों ने पुल के साथ-साथ जनता को महाकाव्य की किसी सुरंग में भेजने का गुप्त प्लान बना रखा था।
कागजों के जादूगर और इंजीनियरों के कारनामे
जरा सोचिए, जिस निर्माण कार्य की उम्र कम से कम कुछ दशक होनी चाहिए थी, उसने पहली ही मानसूनी फुहारों में अपने घुटने टेक दिए। क्या शानदार इंजीनियरिंग है! कागजों पर फाइलें ऐसी मजबूत चलाई गईं कि सीमेंट-बालू की जगह शायद ‘जादूई चूर्ण’ से भराई कर दी गई होगी।
*कागजी घोड़े*: विभागीय इंजीनियरों के दावे ऐसे होते हैं मानों उन्होंने अंतरिक्ष में कोई आधुनिक स्पेस-स्टेशन खड़ा कर दिया हो। निरीक्षण के नाम पर एसी कमरों में बैठकर फाइलें पलटने वाले इन साहबों को क्या कभी अपनी इस ‘सृजनात्मक भूल’ पर शर्म आती है?
*अदृश्य मॉनिटरिंग*: करोड़ों का बजट खर्च हुआ, ठेकेदार ने अपनी जेबें भरीं, और विभाग के नुमाइंदों ने अपनी आंखें मूंद लीं। जब निरीक्षण का वक्त आया होगा, तो शायद इंजीनियर साहब ने चश्मे का नंबर बदलने की बजाय पूरे सिस्टम की आंखें ही बंद रखना उचित समझा होगा।
*यमराज के पहरेदार बने ग्रामीण:*
शुक्रिया मानिए लोकल जनता का!
भला हो उन जागरूक ग्रामीणों का, जिनकी समय पर नजर पड़ गई, वरना किसी दिन कोई बड़ा परिवार अपनी गाड़ी समेत इस ‘भ्रष्टाचार की सुरंग’ में सीधा पाताल लोक की सैर कर रहा होता।
जब विभाग सो रहा था, तब जनता ने अपनी जान जोखिम में डालकर गड्ढे में लकड़ी के डंडे गाड़कर ‘यमराज के पहरेदार’ की भूमिका निभाई। जरा सोचिए, जिस सरकार को जनता की सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए, वहां की जनता खुद अपनी जान बचाने के लिए खुद चौकीदार बनी बैठी है। क्या यही है वह ‘विकास की गंगा’, जो पहली ही बारिश में एप्रोच रोड को बहा ले गई?
अब आगे क्या? लीपापोती या निष्पक्ष जांच?
ग्रामीणों के खून-पसीने के टैक्स के पैसे से बने इस पुल का हश्र देखकर अब हर तरफ एक ही सवाल गूंज रहा है—”इस महा-घपले की जिम्मेदारी कौन लेगा?”
क्या हमेशा की तरह इस बार भी ठेकेदार साहब कुछ बोरियां मिट्टी डालकर गड्ढा भर देंगे और फाइल पर ‘सब चंगा सी’ लिखकर मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा? या सचमुच कोई उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनेगी जो यह जांचेगी कि उस करोड़ों के फंड का असली ‘एक्चुअली’ इस्तेमाल कहां हुआ है?
*जनता की दो-टूक मांग: दोषियों को हो जेल*!
मैनपुर के अवाम ने अब साफ कह दिया है कि इस बार सिर्फ जुबानी जमा-खर्च नहीं चलेगा।
स्वतंत्र तकनीकी जांच: पुल, एप्रोच रोड, डिज़ाइन, और मैटेरियल की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच हो।
कागजातों की कुंडली: निर्माण से लेकर भुगतान तक के हर एक बिल और दस्तावेज को खंगाला जाए।
कठोर कार्रवाई: यदि जांच में जरा भी लीपापोती पाई गई, तो संबंधित ठेकेदार और लापरवाह अधिकारियों को सीधे सलाखों के पीछे भेजा जाए।
20 साल के संघर्ष के बाद मिली यह सौगात यदि 4 महीने में ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, तो यह सिर्फ एक पुल का धंसना नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की नैतिकता और ईमानदारी का कफन है। अब देखना यह है कि सोया हुआ प्रशासन नींद से जागता है या इस सुरंगनुमा गड्ढे में भ्रष्टाचार के सच को हमेशा के लिए दफन कर देता है!






