बस्तर की जनजातीय परंपराओं पर अंतरराष्ट्रीय संवाद, डॉ. लीडिया गुज़ी ने सिरहा की भूमिका पर डाला प्रकाश

रायपुर। 8 जनवरी 2026 को स्कूल ऑफ स्टडीज़ इन एंथ्रोपोलॉजी विभाग द्वारा यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क, आयरलैंड की एसोसिएट प्रोफेसर एवं मार्जिनलाइज़्ड एंड एंडेंजर्ड वर्ल्डव्यूज़ स्टडी सेंटर (MEWSF) की निदेशक डॉ. लीडिया गुज़ी के साथ एक अनौपचारिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर डॉ. गुज़ी ने अपने हालिया बस्तर प्रवास के अनुभव साझा करते हुए जनजातीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की।

डॉ. गुज़ी ने बताया कि बस्तर सहित कई जनजातीय क्षेत्रों में सिरहा केवल एक पारंपरिक चिकित्सक नहीं, बल्कि समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक और आध्यात्मिक कड़ी होता है। सिरहा मानसिक रोगों के उपचार के साथ-साथ जनजातीय समाज और उनके देवी-देवताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और जनजातीय जीवन पद्धति का अभिन्न हिस्सा है।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिकता और बाहरी प्रभावों के कारण जनजातीय युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो सिरहा जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं और जनजातीय विश्वदृष्टि धीरे-धीरे लुप्त हो सकती हैं। ऐसे में इन परंपराओं का दस्तावेजीकरण और संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम के दौरान मानवविज्ञान के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों एवं पूर्व छात्रों ने सक्रिय सहभागिता की और जनजातीय अध्ययन से जुड़े विभिन्न प्रश्नों पर चर्चा की। सत्र ने हाशिए पर पड़े समुदायों और उनके ज्ञान तंत्र को समझने के लिए नए दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।

विभागाध्यक्ष प्रो. जितेंद्र कुमार प्रेमी ने कहा कि जनजातीय समुदायों के लिए एक समान और सार्वभौमिक नीति की आवश्यकता है, जो उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व को भी बढ़ावा दे। उन्होंने जोर दिया कि जनजातीय संस्कृतियों के संरक्षण के लिए ऐसी नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन समय की मांग है।

यह भी पढ़ें

[democracy id="1"]
June 2026
M T W T F S S
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
2930  

टॉप स्टोरीज