राजधानी से जनता तक|कोरबा। प्रधानमंत्री आवास योजना गरीबों को पक्का घर देने की सबसे महत्वपूर्ण एवं महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है, लेकिन यदि इसी योजना में पात्र हितग्राहियों के नाम पर राशि किसी और के खातों में पहुंचने लगे तो इसे क्या कहा जाए? कोरबा विकासखंड की कई ग्राम पंचायतों से सामने आए आरोप अब इसी गंभीर सवाल को जन्म दे रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि योजना के नाम पर बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ है और अब तक जिम्मेदारों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
आरोपों के अनुसार वर्ष 2023-24 में शासन के निर्देश पर ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थायी प्रतीक्षा सूची का सत्यापन कर पात्र और अपात्र हितग्राहियों की सूची तैयार की गई थी। उस समय अपात्र पाए गए लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए थे। इसके बावजूद 14 अप्रैल 2026 को आयोजित ग्राम सभा में बिना किसी नए शासनादेश के उन्हीं लोगों को दोबारा पात्र दर्शाने के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार कर दिए गए। सवाल यह है कि आखिर दो वर्ष बाद ऐसा करने का अधिकार किसने दिया?
ग्रामीणों का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया संबंधित हितग्राहियों की जानकारी और उपस्थिति के बिना पूरी की गई। इतना ही नहीं, जिन लोगों के नाम पर आवास स्वीकृत हुए, उनके स्थान पर दूसरे व्यक्तियों के आधार नंबर और बैंक खाते दर्ज कर दिए गए, जिससे सरकारी राशि वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचने के बजाय अन्य खातों में स्थानांतरित हो गई। बताया जा रहा है कि चिर्रा, देवरमाल, खोड्डल, कुदमुरा, नकिया, नकटीखार और तिलकेजा ग्राम पंचायतों में 44 हितग्राहियों की राशि कथित रूप से दूसरे बैंक खातों में भेजी गई। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी योजना में सुनियोजित आर्थिक अनियमितता का मामला बन सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत स्तर से सूची भेजे जाने के बाद जनपद स्तर पर पंजीयन की प्रक्रिया में भी गंभीर गड़बड़ियां हुईं। विकासखंड स्तर पर आवास योजना से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन शिकायतों ने पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न जरूर लगा दिया है। तिलकेजा ग्राम पंचायत में इससे पहले भी प्रधानमंत्री आवास योजना में अनियमितताओं के आरोप सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद यदि एक बार फिर कई पंचायतों से समान शिकायतें सामने आ रही हैं, तो यह जांच का गंभीर विषय है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गरीबों के आशियाने का सपना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया? 44 हितग्राहियों की राशि दूसरे खातों में कैसे पहुंची? इस पूरे घटनाक्रम का मास्टरमाइंड कौन है? क्या यह केवल कुछ कर्मचारियों का खेल है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? और यदि शिकायतें लगातार मिल रही हैं, तो आखिर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सभी सवालों के जवाब अब प्रशासनिक जांच ही दे सकती है। जब तक निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक प्रधानमंत्री आवास योजना की पारदर्शिता और गरीबों के भरोसे दोनों पर सवाल उठते रहेंगे।
Author: Sangam Dubey
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