कटंगपाली और छेलफोरा बने अवैध माइनिंग के सबसे बड़े “डार्क स्पॉट”..

धरती का सीना चीरकर रसूखदार भर रहे तिजोरियां, धूल फांकने को मजबूर बेबस इंसान…

अनुराज साहू जिला प्रमुख /सारंगढ़ बिलाईगढ़ राजधानी से जनता तक 

सारंगढ़ । विकास की आड़ में विनाश का ऐसा खूनी खेल सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के सरिया और बरमकेला क्षेत्रों में खेला जा रहा है, जिसे देखकर लगता है कि यहाँ सरकार या प्रशासन का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर खनिज माफिया का कानून चलता है। कटंगपाली, छेलफोरा, बिलाईगढ़ ‘अ’ और मौहापाली जैसे क्षेत्र आज अवैध डोलोमाइट खनन के सबसे बड़े गढ़ बन चुके हैं। ओपन कास्ट माइनिंग (खुली खदानों) के नाम पर धरती का सीना चीरकर विशालकाय मौत के कुएं तैयार कर दिए गए हैं, लेकिन मजाल है कि नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी उठाने वाला खनिज विभाग या स्थानीय प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे।

 ‘परमिशन टू डाई’ का खुला निमंत्रण-

इन अवैध खदानों के चारों तरफ न तो कोई सुरक्षा घेरा (बाउंड्री/फेंसिंग) है और न ही दूर-दूर तक कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया है। बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के चल रहे इन विशाल गड्ढों के कारण क्षेत्र में हर वक्त बड़ी दुर्घटना का साया मंडराता रहता है। ऐसा नहीं है कि प्रशासन हादसों से बेखबर है! अतीत में इन अवैध खदानों और क्रेशर उद्योगों में कई बेगुनाह मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके बावजूद, जिला प्रशासन और खनिज अमले ने आज तक इस विषय पर कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की। आखिर प्रशासन इन बेगुनाह मजदूरों की मौतों पर कब तक पर्दा डालता रहेगा?

तपती धूप और उड़ती धूल के बीच मजदूरों का बेदर्दी से शोषण खदानों में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों का बेरहमी से आर्थिक और शारीरिक शोषण किया जा रहा है। न तो उन्हें उचित मजदूरी मिल रही है और न ही सुरक्षा उपकरण।

डोलोमाइट की ड्रिलिंग, कटाई और क्रेशरों से उड़ने वाली जानलेवा धूल के बीच मजदूर बिना मास्क और सुरक्षा किट के काम करने को मजबूर हैं। नतीजतन, ये मजदूर सिलिकोसिस, टीबी और सांस की गंभीर बीमारियों की चपेट में आकर असमय मौत के मुंह में धकेले जा रहे हैं।

भूजल स्तर तबाह, फसलें बर्बाद-

ओपनकास्ट माइनिंग के इन गहरे गड्ढों के कारण पूरे क्षेत्र का जलस्तर (वाटर टेबल) बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बारिश का पानी इन गड्ढों में जमा होने से प्राकृतिक भूजल रीचार्ज रुक गया है, जिससे आसपास के ग्रामीणों के कुएं और बोरवेल सूखने कगार पर हैं। डोलोमाइट की डस्ट (धूल) खेतों में जमने के कारण फसलें पूरी तरह बर्बाद हो रही हैं।

अवैध खनन के विस्तार के लिए अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे वन्यजीवों और पक्षियों का बसेरा छिन चुका है।

ओवरलोड वाहनों के दिन-रात परिचालन से क्षेत्र की सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं, जिससे आम जनता का चलना दूभर हो गया है।

राजस्व का अरबों का चूना-

इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान शासन और स्थानीय पंचायतों को हो रहा है। यदि यह अवैध खनन बंद होकर वैध रूप से संचालित होता, तो सरकार को भारी-भरकम राजस्व मिलता।

गौण खनिज मद और DMF (जिला खनिज संस्थान न्यास) फंड के करोड़ों रुपये जो ग्राम पंचायतों को मिलने चाहिए थे, वे सीधे माफिया की जेब में जा रहे हैं।

यदि यह फंड पंचायतों को मिलता, तो प्रभावित क्षेत्रों में कैंटीन, शुद्ध पेयजल, शौचालय, पक्की सड़कें, स्कूल और आधुनिक अस्पतालों का निर्माण हो सकता था। लेकिन प्रशासन की ‘मेहरबानी’ के चलते जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है और माफिया फल-फूल रहा है।

आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह खूनी खेल?

क्या खनिज विभाग और जिला प्रशासन को इन क्षेत्रों में चल रही विशालकाय जेसीबी और पोकलेन मशीनें दिखाई नहीं देतीं? भारी वाहनों का अवैध परिवहन किसकी शह पर हो रहा है? ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारियों और माफिया के बीच की साठगांठ के कारण ही आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अगर प्रशासन ने जल्द ही इन अवैध खदानों को सील नहीं किया और मजदूरों के हक में कदम नहीं उठाए, तो क्षेत्र की जनता उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।

Rajdhani Se Janta Tak
Author: Rajdhani Se Janta Tak

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