समय से पहले बैनर हटाने से भाजपा संगठन में उबाल, नगर पंचायत अध्यक्ष पर आरोप।

मोहन प्रताप सिंह
राजधानी से जनता तक, सूरजपुर/भटगांव:– नगर पंचायत भटगांव क्षेत्र में बैनर हटाने और नया बैनर लगाए जाने को लेकर भाजपा संगठन के भीतर तीखा विवाद सामने आया है। मामला सामने आते ही मंडल स्तर से लेकर जिला स्तर तक संगठनात्मक मर्यादा, समन्वय और समान व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
विवाद अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती से जुड़े पोस्टर को लेकर उत्पन्न हुआ है। आरोप है कि जयंती की तिथि बीत जाने के बाद नगर पंचायत क्षेत्र में नया पोस्टर लगाया गया, जिसमें जिला भाजपा अध्यक्ष और मंडल अध्यक्ष की तस्वीरें शामिल नहीं की गईं। इसे संगठनात्मक संतुलन के विपरीत कदम बताया जा रहा है।
एक ही फ्रेम बोर्ड में बदलाव से भड़के कार्यकर्ता
मंडल अध्यक्ष रमेश कुमार गुप्ता ने आरोप लगाया कि जिस फ्रेम बोर्ड में अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती का पोस्टर लगाया गया, उसी स्थान पर पहले मंत्री के जन्मदिवस का बैनर लगा हुआ था। यह बैनर नगर पंचायत अध्यक्ष भटगांव परमेश्वरी राजवाड़े के निर्देश पर समय से पहले उतरवाया गया।
उनका कहना है कि यह कार्रवाई बिना संगठनात्मक चर्चा और सहमति के की गई, जिससे मंडल पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में नाराजगी फैल गई।
पर्व विशेष के बैनर अब भी लगे होने का दावा
मंडल अध्यक्ष ने कहा कि जहां मंत्री के जन्मदिवस से जुड़ा बैनर हटवा दिया गया, वहीं नगर पंचायत अध्यक्ष के दशहरा, दिवाली और छठ पर्व से संबंधित बैनर अब भी उसी स्थान पर लगे हुए हैं। इस स्थिति ने चयनात्मक कार्रवाई और पक्षपातपूर्ण निर्णय के आरोपों को और बल दिया है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन के भीतर समानता और अनुशासन की अपेक्षा होती है, लेकिन इस घटनाक्रम ने उस संतुलन को प्रभावित किया है।
मंडल और जिला पदाधिकारियों के अपमान की चर्चा
मंडल अध्यक्ष रमेश कुमार गुप्ता ने इस पूरे घटनाक्रम को संगठनात्मक मर्यादा के विपरीत बताया। उन्होंने कहा कि जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों की उपेक्षा कर लिए गए फैसले संगठन में गलत संदेश देते हैं और इससे पार्टी की एकजुटता पर असर पड़ता है।
उनका कहना है कि इस तरह की घटनाएं कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराती हैं और आपसी समन्वय को कमजोर करती हैं।
समीक्षा और सुधार की उठी मांग
बैनर विवाद सामने आने के बाद पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। मंडल स्तर पर मांग की जा रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा की जाए और भविष्य में सार्वजनिक प्रचार से जुड़े निर्णय संगठनात्मक प्रक्रिया के तहत लिए जाएं।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते इस तरह के मामलों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर संगठन की छवि और कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।

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