मैनपुर/गरियाबंद: एक तरफ आधुनिक भारत की गूँज है, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का मैनपुर विकासखंड है, जहाँ आज भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। यहाँ के निवासियों के लिए ‘बारिश’ खुशहाली नहीं, बल्कि एक बड़ा संकट बनकर आती है। राज्य निर्माण के 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी दर्जनों गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए नदी-नालों पर पुल-पुलियों का निर्माण नहीं हो सका है।

जान हथेली पर रखकर सफर करने को मजबूर ग्रामीण
उदंती अभ्यारण्य के भीतर बसे ग्राम साहेबिनकछार, कोदोमाली, नागेश, करलाहार, पयलीखण्ड, अमाड़ और देवहार अमली जैसे दर्जनों गांवों के लोग हर साल बरसात के दिनों में बाहरी दुनिया से कट जाते हैं। उफनती नदियों के कारण ये गांव टापू में तब्दील हो जाते हैं।
हालात इतने बदतर हैं कि
स्वास्थ्य सेवाएँ ठप: बीमारों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुँचाना एक बड़ी चुनौती है। समय पर इलाज न मिलने से कई बार असमय मौतें हो रही हैं।
बच्चों की जान दांव पर: मासूम बच्चों को स्कूल जाने के लिए जान जोखिम में डालकर नदी-नाले पार करने पड़ते हैं। इस असुरक्षित सफर में अब तक दो छात्र अपनी जान भी गंवा चुके हैं।
जुगाड़ ही सहारा: पुल न होने से ग्रामीण कंधों पर सामान या बच्चों को बिठाकर, तो कहीं नाव, चट्टी या ट्यूब के सहारे उफनती नदियों को पार करने को मजबूर हैं।
जनप्रतिनिधियों का क्या है कहना?
बिन्द्रानवागढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक जनक ध्रुव ने इस गंभीर स्थिति पर अपनी बात रखते हुए कहा कि उन्होंने बाकड़ी नदी पर पुल निर्माण के लिए संबंधित मंत्री को ज्ञापन सौंपा था। विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण और स्टीमेट तैयार करने के बावजूद अब तक काम शुरू नहीं हुआ है। विधायक ने आश्वासन दिया है कि वे इस मामले को विधानसभा में प्रमुखता से उठाएंगे और राजापड़ाव, गौरगांव व उदंती अभ्यारण्य क्षेत्र में पुल-पुलियों की मांग के लिए निरंतर प्रयास जारी रखेंगे।
सत्ता के गलियारों में केवल ‘आश्वासन’
बिन्द्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव ने स्वीकार किया कि बाकड़ी नदी पर पुल की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपे गए और विभाग ने स्टीमेट भी बना लिया, लेकिन फाइलों के बोझ तले निर्माण कार्य अब तक दबा हुआ है। प्रश्न यह है कि जनप्रतिनिधियों के ‘प्रयास’ और ‘विधानसभा में आवाज उठाने’ के दावों के बीच आम जनता को कब तक मौत के मुहाने पर खड़ा रहना पड़ेगा?
हमारी मांग, प्रशासन की जवाबदेही
क्या राज्य का आदिवासी अंचल केवल चुनावी वादों तक सीमित है?
ग्रामीणों की यह पीड़ा प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण है। शासन-प्रशासन को जल्द से जल्द पुल-पुलियों का निर्माण कर इन दुर्गम क्षेत्रों को सुरक्षित मार्ग प्रदान करना होगा।






